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13-अक्टूबर-2017 13:58 IST

पर्यटन पर्व: भारत की विविधता के अन्वेषण का एक विशेष अवसर

समय आ गया है कि आम पर्यटन स्थलों पर जाने के बजाय भारतीय देश के खूबसूरत नुक्कड़ों, कोनों को खोजें। होटलों में ठहरने के बजाय पारंप

विशेष लेख

विशेष: पर्यटन पर्व (5 अक्टूबर- 25 अक्टूबर, 2017)

 

*निवेदिता खांडेकर

 

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने हाल ही के संवाद ‘मन की बात’ में लोगों से अपील की कि वे अद्भुत भारत के विभिन्न अद्भुत स्थलों को खोजें। इसी से प्रेरित पर्यटन मंत्रालय ने पर्यटन पर्व का आयोजन किया है जिसे ‘भारतीय समृद्ध पर्यटन धरोहर के उत्सव’ के रूप में माना जा रहा है |

केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय अन्य केंद्रीय मंत्रालयों, विभिन्न राज्य सरकारों और निवेशकों के साथ मिलकर पर्यटन पर्व का आयोजन समस्त भारत में  5-25 अक्टूबर, 2017 हो रहा है। इसका उद्देश्य पर्यटन के लाभों पर ध्यान आकर्षित करना, हमारी सांस्कृतिक विविधता का प्रदर्शन करना एवं ‘सबके लिए पर्यटन’ के सिद्धांत को सुदृढ़ करना है ।

यह एक अद्भुत संयोग है कि पर्व-प्रेमी भारत देश में इस पर्यटन पर्व का आयोजन उस समय किया जा रहा है जब देश में त्योहारों कि धूम एवं उत्साह का माहौल है। साथ ही यह समय ऐसा है जब लोग घर व शहर से बाहर निकलकर किसी स्थान पर घूमने का समय निकालते हैं परन्तु आमतौर पर लोग नए, शांत और थोड़े अनजान स्थान खोजने के बजाय उन्हीं पुरानी और भीड़भाड़ वाली जगहों पर जाते हैं। समय आ गया है कि आम पर्यटन स्थलों पर जाने के बजाय भारतीय देश के खूबसूरत नुक्कड़ों, कोनों को खोजें, होटलों में ठहरने के बजाय पारंपरिक एवं सांस्कृतिक लोगों के साथ रहें।

पर्यटन पर्व यही अवसर देता हुआ दिखाई दे रहा है। भारत सरकार की इस योजना से दो अति महत्त्वपूर्ण बातें मेरी समझ में आई हैं - ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ योजना के अंतर्गत अन्तर्राज्यीय संबध तथा सी.बी.एस.ई. मान्यता प्राप्त विद्यालयों को अन्य गतिविधियों के साथ विरासत रूप स्मारकों की यात्रा हेतु दिशा-निर्देश देना।

देखा जाए तो स्कूली बच्चों के लिए स्मारकों के दर्शन का विचार नया नहीं है लेकिन ‘पर्यटन एवं अध्ययन’ से इसे जोड़ना इसे नया बनाता है। कल्पना करें कि एक कक्षा महाराष्ट्र के एक किले में बैठकर छत्रपति शिवाजी की विजय के बारे में पढ़ रही हो या अकबर ने क्या किया यह आगरा के किसी किले में बैठकर सीखा जा रहा हो। ये स्मारक ज्ञान एवं जानकारी का खजाना हैं। वे केवल इतिहास के पाठ ही उपलब्ध नहीं कराते बल्कि उस युग के शिल्पकला और परंपरागत प्रथाओं से भी अवगत कराते हैं। वास्तविक दर्शन से बेहतर सीखने का कोई और तरीका नहीं हो सकता।

भारत का सौभाग्य है कि यह 3500 से अधिक स्मारकों से संपन्न है और 10,000 अन्य स्मारकों की देख-रेख राज्य सरकारें करती हैं।

इसी प्रकार कल्पना करें कि केरल हिमाचल प्रदेश के साथ इस प्रकार का आगमन-निगमन करे या मध्य प्रदेश नागालैंड और मणिपुर के बारे में अधिक जानकारी की खोजबीन करे। कितनी सुन्दर संकल्पना होगी यदि अच्छी तरह स्थापित हो। आदि शंकराचार्य ने चार धामों की स्थापना देश के चार कोनों में और बारह ज्योतिर्लिंगों की स्थापना देश के विभिन्न स्थलों पर इसी संकल्पना सिद्धि के लिए की थी।

न केवल तीर्थ स्थलों के लिए परन्तु विस्तृत धरती की समृद्ध परम्पराओं और संस्कृति को जानने के लिए लोगों को अन्य राज्यों, शहरों से भी जुड़ना चाहिए। इसी सोच और ध्येय को धारण कर पर्यटन मंत्रालय ने ‘पर्यटन पर्व’ की संकल्पना की जिससे एक-दूसरे की भाषा, संस्कृति, परंपरा एवं प्रथाओं का ज्ञान प्राप्त कर बेहतर संबंध बने। यह भारतीय एकता एवं अखंडता का सशक्तिकरण होगा। 

घरेलु पर्यटन का उदय:

नमस्ते! पूरे विश्व में भारत की पहचान रहा है। लम्बे समय से भारत ने विश्वभर के पर्यटकों को आकर्षित किया है। जब विदेशी सैलानियों से विदेशी मुद्रा का भारत आना और उन्हें यहाँ प्राथमिकता दिया जाना महत्त्वपूर्ण है, तब घरेलू पर्यटकों को भी नज़रंदाज़ न करना उतना ही ज़रूरी है।  

पर्यटन मंत्रालय की सालाना रिपोर्ट के अनुसार 2016-17 में घरेलू पर्यटन का महत्त्वपूर्ण योगदान भारतीय पर्यटन सेक्टर में रहा है। राज्य पर्यटन एवं पर्यटन मंत्रालय के आकंड़ों के अनुसार घरेलू सैलानियों की संख्या 2014 में 1282.8 मिलियन के मुकाबले 2015 में 1432 मिलियन रही, जो 11.63% वृद्धि थी।

विदेशी सैलानियों के आगमन का यह आंकड़ा(8.03 मिलियन) बहुत बड़ा है तथा पिछले साल के मुकाबले 4.5 % की वार्षिक वृद्धि भी दिखा रहा है। निवेशकों और इस सेक्टर से जुड़े लोगों को घरेलू पर्यटन के बढ़ते झुकाव को समझने की ज़रुरत है।

उदाहरण के तौर पर लगभग 190.67 मिलियन सैलानी 1999 में थे जो 2015 में बढ़कर 1,431.97 मिलियन हो गए। इस उद्योग ने 16 सालों में 651.02% का उदय देखा। इसी को ध्यान में रखते हुए सरकार ने मार्च 2018 तक संशोधित पर्यटन पॉलिसी बनाने कि पहल की है। पहले एक समय ऐसा था जब लोग केवल तीर्थयात्राओं के लिए ही बाहर निकलते थे और यह केवल अमीर लोगों का ही शौक हुआ करता था, परन्तु अब आम महिला पुरुष भी सामान्य स्थलों के अलावा नई जगहों कि खोज कर रहे हैं। इस प्रकार घरेलू पर्यटन का दायरा बढ़ा है जिससे सरकार और निवेशकों को सकारात्मक रवैया अपनाकर इस सेक्टर को और आगे बढ़ाने के लिए संभव द्वार खुले हैं।

पर्यटन आधारिक संरचना एवं आम जीवन

पर्यटन मंत्रालय और अन्य मत्रालयों के साथ राज्य सरकारों द्वारा बनाई गई विस्तृत योजना इसकी विविधता और असीम संभावनाओं पर ध्यान केंन्द्रित करती है कि कैसे इसका प्रभाव अन्य मंत्रालयों/ क्षेत्रों- शिक्षा, संस्कृति, कपड़ा-उद्योग एवं उत्तर-पश्चिमी राज्यों के विकास, ग्रामीण विकास और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय पर पड़ता है। पर्यटन को निश्चित एवं स्थिर आधारिक संरचना की, शांतिपूर्ण क़ानून व्यवस्था की और निमंत्रित सैलानियों की आवश्यकता है। इसके बदले में पर्यटन स्थानीय लोगों को रोज़ी रोटी और सरकार को राजस्व देता है।

भारत को इसके मेहमाननवाजी के लिए विश्वभर में जाना जाता है साथ ही इसकी क़ानून व्यवस्था पर्यटन-प्रिय है। कुछ शहरों और मुख्य जगहों को छोड़कर भारतीय पर्यटन को आधारिक संरचना में विकास एवं सुधार की आवश्यकता है। छोटे स्थलों को प्रचार-प्रसार के लिए पहचाना जाना चाहिए तथा सैलानियों के लिए आधारभूत सुविधाएँ बढ़ानी होंगी जैसे- ठहरने के अच्छे स्थान, भोजन।

पर्यटन मंत्रालय ने शहरी इलाकों में बी एंड बी(ब्रेड एंड ब्रेकफास्ट) भवनों के विकास एवं निर्माण को बढ़ावा दिया है लेकिन अब समय ग्रामीण इलाकों में गृहनिवास (होम स्टे) बनाने पर ध्यान देना चाहिए। केवल यह भवन ही पर्यटन को स्थिरता दे सकते हैं क्योंकि बड़े होटल तो केवल वहां के प्राकृतिक संसाधनों की लूट में लगे हैं। स्थानीय गृहनिवास स्थानीय लोगों से सीधा संपर्क बनाने और उनकी सभ्यता संस्कृति को जानने में मददगार साबित होगा। यह व्यवस्था स्थानीय लोगों को भी रोजी रोटी कमाने का अच्छा अवसर देगी।

पर्यटन पर्व इन ढीले सूत्रों को जोड़ने का एक अच्छा अवसर साबित हो सकता है, न केवल वर्तमान के लिए अपितु स्थिर-सुदृढ़ पर्यटन के भविष्य के लिए भी।

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निवेदिता खांडेकर दिल्ली की एक स्वतन्त्र पत्रकार हैं | वह पर्यावरण एवं विकास के मुद्दों पर लिखती हैं | इस लेख पर दिए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं |

 

वीएल/पीकेडी/एसएस-195