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30-अक्टूबर-2017 19:27 IST

पटेल: जीवन, सन्देश, एवं उनकी अनंत प्रासंगिकता

विशेष – राष्ट्रीय एकता दिवस(31 अक्टूबर)


*गुरु प्रकाश

“काम पूजा है लेकिन हास्य जीवन है | जो जीवन को अति गंभीरता से जीता है उसे अपने दुखी अस्तित्व के लिए भी तैयार रहना चाहिए |”


इस कथन को एक संत की बेहतरीन सोच के रूप में भी गलत समझा जा सकता है जिसने इस विश्व का त्याग कर दिया और एक विशेष कार्य के लिए जीवन अर्पित कर दिया | पूर्वकथन को लौह पुरुष बल्लभ भाई पटेल के अन्य गैर-राजनीतिक कथनों में से एक मानना मुश्किल है |


प्रारंभिक जीवन एवं किसानी संघर्ष

गुजरात के कैरा जिले के नादियाद गाँव के किसान लदबाई और झावेरिबाई पटेल के घर पांच भाई-बहनों में पैदा हुए | बल्लभभाई इससे कहीं दूर स्वतंत्रता और एकता के अतिविशाल उद्देश्य को पूरा करने के लिए तैयार हुए | जीवन के महत्त्वपूर्ण सालों में इनकी माँ ने इनकी मानसिकता पर गहरी छाप छोड़ी |
एक आम ग्रामीण परिवेश में इनकी माँ बच्चों को इकठ्ठा करती और रामायण, महाभारत की कहानियाँ सुनाती | इसी दौरान युवा पटेल पर आध्यात्मिक छाप पड़ी तो पिता ने किसानी ज़िन्दगी से रूबरू करवाया | पिता के साथ खेत-खलियानों में घूमते-घूमते युवा पटेल जमीन की बुआई, मवेशियों के व्यापार में पारंगत हो गए | अपनी किसानी की ओर इनका इतना अधिक प्रेम था कि एक बार अमरीकी पत्रकार द्वारा इनकी सांस्कृतिक गतिविधि के बारे में पूछे जाने पर इन्होने जवाब दिया- आप कुछ और पूछें, मेरी संस्कृति तो कृषि ही है |


संघर्ष का पहला चरण जो पटेल को सार्वजनिक जीवन में ले आया वह था किसान नेता के रूप में उनका सफ़र | सार्वजनिक जीवन एवं स्वतंत्रता आन्दोलन में धावा बरोड़ और खेड़ा में इनके सफल सत्याग्रहों से संभव हो पाया जहाँ इनके नेतृत्व और आम सहमति ने अत्यधिक राजस्व मामले में अंग्रेजों को घुटनों पर खड़ा कर दिया था |

राजनीति और राजनीतिक कुशाग्रता

सरदार पटेल नेतृत्व की उस वर्ग से आते हैं जिन्होंने स्वतंत्रता संघर्ष और स्वतंत्रता पश्चात देश की संरचना दोनों में सकारात्मक दिशा दिखाई |

“हमने अथक परिश्रम से स्वतंत्रता पाई है, हमें इसका औचित्य साबित करने के लिए और भी कठिन प्रयास करने होंगे |”
पटेल इस तथ्य से भली-भाँति अवगत थे कि स्वतन्त्र भारत को मजबूत नागरिक, सैन्य, एवं प्रशासनिक ढाँचे की ज़रुरत है | संस्थागत तंत्र जैसे व्यवस्थित सेना व व्यवस्थित नौकरशाही में उनका अटूट विश्वास बाद में एक वरदान साबित हुआ | ये पटेल ही थे जिन्होंने उपयुक्त समय पर लक्षद्वीप में सेना भेजी जब पाकिस्तान महत्वपूर्ण द्वीपों पर कब्ज़ा करके की फिराक में था | इस बात की कोई भी कल्पना कर सकता है कि यदि हमारे पडोसी देश अपने इरादों में कामयाब हो जाते तो हमारी क्या दुर्दशा होती |

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एवं पटेल

16 जुलाई 1949 के एक पत्र में टी. आर. वेंकटरमा शास्त्री को पटेल कहते हैं- “मैं स्वयं इनपर लगे प्रतिबन्ध को हटाने के पक्ष में था..... मैंने आर.एस.एस. को यह सलाह दी थी कि वे आतंरिक कांग्रेस में सुधार लाएँ यदि वह सही रास्ते पर नहीं चल रही |”
एक अन्य पत्र में आर.एस.एस. के दूसरे सरसंघचालक गोल्वारकर सरदार पटेल को लिखते हैं- मैंने अब तय किया है कि अब मैं वेंकटरामा जैसे मित्रों से मिलूँगा | आपकी सेहत बिगड़ी है और मुझे इससे बेचैनी हुई है | देश को आपकी सशक्त मार्गदर्शन और सेवा की बहुत आवश्यकता है | मैं ईश्वर से आपकी दीर्घ और स्वस्थ आयु की कामना करता हूँ | मुझे आशा है जब तक मैं आपसे मिलूँगा आपकी सेहत में काफ़ी सुधार हो चुका होगा | ह्रदय के कुछ भाव भाषा द्वारा अभिव्यक्त नहीं हो पाते, मुझे यह आभास आपको पत्र लिखते हुए हो रहा है |
यह बातचीत इस बात को पुख्ता करती है कि सरदार पटेल बिना किसी टकराव के दूसरों के विचारों को स्वीकार करते थे |

सरदार पटेल शायद गांधी, नेहरू और पटेल कि तिकड़ी में आज़ादी के समय और उसके तुरंत बाद सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति थे | हमारे देश के बहुत लोगों को यह अहसास नहीं है कि भारत का मानचित्र जैसा आज दिखता है वैसा शायद न दिखता अगर पटेल न होते | उनके बिना भारत के कई हिस्सों के कई टुकडे हो चुके होते | उन्होंने अपने दम पर ही प्रान्तों के विघटन को रोका | केवल कश्मीर पर वे अपनी नीति लागू नहीं कर पाए जिसकी कीमत आज भी हम चुका रहे हैं | गांधी के बाद और कई बार महात्मा से भी बेहतर वही भारतीय संस्कृति की जड़ों और प्रकृति को समझते थे | अगर वे आज़ादी के बाद एक दशक और जी लेते तो भारत के कई मुद्दे सुलझ चुके होते | ऐसा हिंदोल सेनगुप्ता का मानना है जो पटेल की जीवनी ‘द मैन हू सेव्ड इण्डिया’ के लेखक हैं |

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*लेखक वरिष्ठ शोधकर्ता के रूप में इण्डिया फाउंडेशन नई दिल्ली में कार्यरत हैं | ये लेखक के निजी विचार हैं |

वीएल/पीकेडी/एसएस-202