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भारत सरकार
उप राष्ट्रपति सचिवालय
14-सितम्बर-2018 12:37 IST

हिन्दी को महज कार्यालयों से निकाल कर जन विमर्श की भाषा बनायें : उपराष्ट्रपति

हिंदी दिवस समारोह पर संबोधन

हिंदी दिवस के अवसर पर सरकार के राजभाषा विभाग द्वारा विज्ञान भवन में आयोजित समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए, माननीय उपराष्ट्रपति  श्री एम. वेंकैया नायडु ने कहा कि “किसी भाषा का उत्सव एक दिवस के रूप में मनाना अपने आप में भाषा के विस्तार, सामाजिक जीवन के विभिन्न आयामों में उसकी व्यापकता को सीमित करता है। भाषा राजकीय उत्सवों से नहीं बल्कि जनसरोकारों और लोक पंरपराओं से समृद्ध होती है।” उन्होंने कहा कि यह स्वीकार करना होगा कि आज तक हम हिंदी को उसके उचित स्थान तक नहीं पहुंचा पाये हैं। आज भी हमारा राजकीय कार्य प्राय: अंग्रेजी में ही होता है।

 

14 सितंबर 1949 को ही संविधान सभा ने हिंदी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया था। श्री नायडु ने पूछा कि “क्या हम संविधान सभा की आशाओं पर खरे उतरे हैं? आज हिंदी दिवस के अवसर पर इन प्रश्नों के प्रति हम उत्तरदायी हैं।” उन्होंने कहा कि संविधान सभा ने हिंदी को राजभाषा स्वीकार करते हुए भी अन्य भारतीय भाषाओं की मर्यादा और महत्ता को संविधान की आठवीं अनुसूची में अंगीकार किया। भारत की भाषाई विविधता पर बल देते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा “सभी भाषाएं हमारी हैं, हमारे पूर्वजों के ज्ञान की धरोहर हैं। यह प्रश्न भाषाई प्रतिस्पर्धा या वैमनस्य का है ही नहीं।”

 

उपराष्ट्रपति ने राजभाषा विभाग से संविधान की धारा 351 के अंतर्गत अपेक्षाओं के प्रति सजग रहने को कहा, जिसमें हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में सौहार्द और सामंजस्य की अपेक्षा की गई है। उन्होंने कहा यह अपेक्षा की गई थी कि “संघ हिंदी के प्रसार के लिए प्रयत्न करेगा और हिंदी को इस प्रकार विकसित करेगा कि वह देश की मिलीजुली संस्कृति को अभिव्यक्त कर सके। संघ से यह भी अपेक्षा थी कि हिंदी को समृद्ध बनाने के लिए संस्कृत, हिन्दुस्तानी और अन्य भारतीय भाषाओं के मध्य सतत संवाद को प्रोत्साहन देगा। जहां तक संभव हो भारतीय भाषाओं के शब्द, मुहावरे, लोकोक्तियों से हिन्दी को समृद्ध किया जायेगा।” इस संबंध में उपराष्ट्रपति ने राजभाषा हिंदी भाषी कर्मचारियों के लिये अन्य भारतीय भाषाओं के छोटे ऑनलाइन कोर्स विकसित करने की सलाह दी।

 

इस अवसर पर उपराष्ट्रपति ने उनके द्वारा राज्य सभा में की गई पहलों का भी जिक्र किया गया। उन्होंने बताया कि राज्यसभा की हिन्दी सलाहकार समिति की बैठकें अब साल में दो बार होगी जिसमें एक बैठक गैर हिंदी भाषी प्रदेश में होगी। उन्होंने कहा “मैंने स्वयं इस दिशा में प्रयास किये हैं। मैंने अहिंदी भाषी क्षेत्रों से आने वाले सांसदों को हिंदी में बोलने के लिए प्रोत्साहित किया है। सांसदों को अपने क्षेत्र के मुद्दे बेहिचक अपनी मातृभाषा में ओजस्वी रूप से उठाने के लिए, राज्य सभा में सभी 22 भारतीय भाषाओं में अनुवाद की सुविधा उपलब्ध कराई गई है। इससे सांसदों को अपने विचार रखने के लिए भाषाई सीमा से बंधना नहीं पड़ेगा।”

 

हिन्दी दिवस के अवसर पर गृहमंत्री श्री राजनाथ सिंह, राज्यमंत्री श्री हंसराज अहीर और किरण रीजीजु की उपस्थिति में उपराष्ट्रपति ने विभिन्न श्रेणियों में सरकारी मंत्रालय, सार्वजनिक उपक्रमों, बैंकों और सरकारी संस्थाओं को हिंदी में कार्यकलाप करने के लिये 66 पुरस्कार दिये।

 

हिन्दी के स्वाध्याय के लिये ‘प्रवाह’ एप और ऑनलाइन हिन्दी अनुवाद के लिये ‘कंठस्थ’ का भी उद्घाटन किया गया।

 

उपराष्ट्रपति के भाषण का मूल पाठ निम्नलिखित है:

 

"देवियो और सज्‍जनो ! हिंदी दिवस के शुभ अवसर पर मैं आप सभी को, समस्त देशवासियों को और विश्व भर के सभी हिंदी प्रेमियों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं देता हूँ I हिंदी दिवस समारोह में पहली बार आप सभी के बीच उपस्थित होकर मुझे बहुत खुशी हो रही है I

 

  1. संघीय लोकतंत्र और लोकसत्ता के प्रति सम्मान का यह अद्वितीय उदाहरण है कि भारत की संविधान-सभा ने 14 सितम्बर, 1949 की अपनी बैठक में सर्वसम्मति से देश की एक ऐसी भाषा को भारत संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया जो राष्ट्र के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान स्वाधीनता सेनानियों के बीच सम्पर्क का प्रमुख माध्यम रही, जो विविधता में एकता का सूत्र रही, जो देश के ज़्यादातर भागों में अधिकांश लोगों द्वारा सबसे अधिक बोली-समझी जाती रही है और जो देश के सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, साम्प्रदायिक एवं भाषायी समन्वय व सौहार्द का प्रतीक थी; और वह भाषा थी – हिंदी। आज भी हिंदी की यही विशेषताएं उसे अन्य भाषाओं की अपेक्षा अधिक स्वीकार्य बनाती हैं। प्रत्येक वर्ष 14 सितम्बर को हिंदी दिवस मनाए जाने की पृष्ठभूमि और आधार यही है।
  2. यह विचारणीय विषय नहीं है कि हिंदी भारत की समृद्धतम और श्रेष्ठतम भाषा है क्योंकि देश की कई अन्य भाषाएं हैं जो हिंदी से ज्यादा पुरानी और समृद्ध हैं I संस्कृत तो सभी भारतीय भाषाओं की जननी है और हमारे पास अत्यंत समृद्ध क्षेत्रीय भाषाएँ भी हैं I विचारणीय विषय यह है कि हिंदी सर्व-सुलभ और सहज ग्रहणीय भाषा है, अधिकांश जनता की भाषा है, उसका स्वरूप समावेशी है और उसकी लिपि देवनागरी विश्व की सबसे पुरानी एवं वैज्ञानिक लिपियों में से है, उसका शब्द भंडार एक तरफ संस्कृत से तो दूसरी तरफ अन्य अनेक देशी – विदेशी भाषाओं के शब्दों से समृद्ध हुआ है यानि उसके शब्द भंडार में तत्सम, तदभव, देशज और विदेशी शब्दों का समावेश है I इस प्रकार हिंदी आधुनिक भी है और पुरातन भी है I हिंदी के ये ही गुण उसे मात्र एक भाषा के दर्जे से ऊपर एक संस्कृति होने का सम्मान दिलाते हैं ।
  3. भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में केंद्र सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं का लाभ देश के अंतिम व्‍यक्‍ति तक पहुंचाने के लिए भाषा का अत्‍यधिक महत्‍व है। सरकार की कल्‍याणकारी योजनाएं तभी प्रभावी बन सकेंगी जब आम जनता उनसे लाभान्‍वित होगी। इसके लिए आवश्‍यक है कि शासन का काम-काज आम जनता की भाषा में किया जाए । हमारे लिए यह समझना जरूरी है कि राजभाषा हिंदी के माध्‍यम से देश की जनता की सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्‍कृतिक सभी प्रकार की अपेक्षाओं को पूरा करने वाली योजनाओं व कार्यक्रमों को आखिरी सिरे तक पहुंचाना सरकारी तंत्र का अति महत्‍वपूर्ण कर्तव्‍य है और उसकी सफलता की कसौटी भी। यदि हम चाहते हैं कि हमारा लोकतंत्र निरंतर प्रगतिशील रहे, और अधिक मजबूत बने तो हमें संघ के काम-काज में हिंदी का तथा राज्‍यों के कामकाज में उनकी प्रांतीय भाषाओं का ही प्रयोग करना होगा । हिंदी को उसके वर्तमान स्‍वरूप तक पहुंचाने में देश के सभी प्रदेशों का महत्‍वपूर्ण योगदान रहा है ।

 

  1. भारत की सभी भाषाएं समृद्ध हैं । उनका अपना साहित्‍य, शब्‍दावली तथा अभिव्‍यक्‍तियां एवं मुहावरे हैं । इन सभी भाषाओं में भारतीयता की एक आतंरिक शक्‍ति भी है । भले ही हमारी भाषाएं अलग-अलग हों, इन्हें बोलने वाले लोग देश के अलग-अलग भागों में रहते हों, पर ये सभी भाषाएँ भावनात्मक रूप से हमारी साझी धरोहर हैं I इससे हमारी राष्‍ट्रीय एकता और मजबूत होगी तथा भारत की विविध संस्‍कृति को बेहतर रूप में अभिव्‍यक्‍त किया जा सकेगा । हिंदी को केवल बोलचाल के स्‍तर पर ही संपर्क भाषा नहीं बनना है, बल्‍कि कला और साहित्‍य के स्‍तर पर भी यह दायित्‍व निभाना है । हमारी क्षेत्रीय भाषाओं के साहित्‍य का हिंदी में अधिक से अधिक अनुवाद होना चाहिए ताकि पूरे देश का साहित्‍य हमें आसानी से उपलब्‍ध हो सके । इसके साथ ही, हिंदी साहित्‍य का भी अन्‍य भारतीय भाषाओं में अनुवाद होना चाहिए। इससे न केवल राष्‍ट्रीय एकता बढ़ेगी बल्‍कि वैचारिक, सांस्‍कृतिक और भावनात्‍मक आदान-प्रदान से भारतीय साहित्य और भारतीय भाषाएँ भी समृद्ध होंगी I मेरा ये भी मानना है कि हिंदी को केवल मनोरंजन एवं साहित्‍य तक सीमित न रखा जाए अपितु शिक्षा, ज्ञान-विज्ञान, सूचना प्रौद्योगिकी एवं वाणिज्‍य में भी इसका अधिकाधिक उपयोग हो ।

  

  1. भारत आज एक युवा राष्ट्र है जिसका लगभग 65 प्रतिशत हिस्सा 35 साल से कम आयु की आबादी का है। किसी अन्य राष्ट्र को मानव संसाधन का इतना बड़ा लाभ प्राप्त नहीं है। युवाओं को अपनी भाषा में सही शिक्षा, ज्ञान और कौशल प्रदान करके हमें इस विशाल मानव पूंजी को राष्ट्रीय संपत्ति सर्जकों में परिवर्तित करने की जरूरत है। मेरा यह मानना है कि हिंदी का विस्तार शिक्षा, ज्ञान-विज्ञान, सूचना प्रौद्योगिकी एवं वाणिज्‍य में अधिकाधिक होने से युवा पीढ़ी को विकास के बेहतर अवसर मिल सकेंगे । हमारा यह प्रयास होना चाहिए कि हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं को लोगों की रोज़ी-रोटी से जोड़ा जाए यानि अपनी भाषाओं के अध्ययन से लोगों को रोजगार के अधिक अवसर मिलने चाहिएI
  2. भारत आज विश्व की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है । आज जब भारत की दुनिया की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में से एक बनने की संभावना है, सभी देशवासियों को अपने सपनों को साकार करने और देश के विकास में योगदान देने के लिए सही दिशा में अपने ज्ञान, कौशल और ऊर्जा को लगाना होगा। ऐसा हिंदी और देश की भाषाओं के अधिकाधिक प्रयोग से ही संभव है क्योंकि कोई भी देश विदेशी भाषा के बूते पर प्रगति नहीं कर सकता I
  3. गांधीजी ने न केवल हमारे स्वाधीनता संग्राम का नेतृत्व किया,बल्‍कि वह हमारे नैतिक पथ-प्रदर्शक भी थेऔर सदैव रहेंगे। गांधी जी ‘स्वदेशी’ पर बहुत ज़ोर दिया करते थे। स्वदेशी की यह सोच आज भी उपयोगी और प्रासंगिक है। गांधी जी ने हिंदी को भारतीय चिंतन-धारा का स्वाभाविक विकास क्रम माना I हिंदी भाषा का प्रश्न उनके लिए स्वराज्य का प्रश्न था I आइए हम सब भारतवासी अपने दिन-प्रतिदिन के आचरण में, उनके द्वारा सुझाए गए रास्तों पर चलने का संकल्प लें। भारतीयता के गौरव को महसूस करने का, इससे बेहतर कोई और तरीका नहीं हो सकता।
  4. ‘वसुधैव कुटुंबकम’ भारत की उदार सांस्‍कृतिक चेतना और विश्‍व दृष्‍टि का प्रतीक है । हमारी हिंदी इसी भाव बोध का प्रतिनिधित्‍व करती है । हिंदी भाषा हमारी सबसे बड़ी, सबसे मज़बूत, सबसे अधिक प्रभावशाली तथा अनमोल धरोहर है । हमें इसका सबल उत्‍तराधिकारी बनना है । भूमंडलीकरण के कारण पूरे विश्‍व में तेजी से बदलते आर्थिक एवं वित्‍तीय परिवेश में वैश्‍विक स्‍तर पर हिंदी की गूंज रही है । अपनी इस नई पहचान के कारण हिंदी विश्‍व बाज़ार के लिए एक प्रभावशाली और ताकतवर भाषा बन कर उभरी है।

 

  1. हिंदी का महत्त्व हमारे संविधान निर्माताओं ने प्रारम्भ में ही स्वीकार कर लिया था जिसे अब सारे संसार ने भी मान लिया है I देश – विदेश के सैकडों विश्वविद्यालयों में एक विषय के रूप में हिंदी की पढाई होती है, ज्ञान – विज्ञान की मौलिक पुस्तकें हिंदी में भी लिखी जा रही हैं, आज हिंदी सोशल मीडिया और संचार माध्यमों की प्रमुख भाषा बन गई है, विशेष रूप से हिंदी कमेंटरी वाले टीवी चैनल शुरू हो रहे हैं, निजी और सरकारी क्षेत्र की देशी - विदेशी आईटी व व्यावसायिक कम्पनियां भारत की ओर रुख करने के लिए हिंदी का महत्व स्वीकार कर रही हैं I

 

  1. 18-20 अगस्त, 2018 को विदेश मंत्रालय द्वारा मारिशस में आयोजित ग्यारहवें विश्व हिंदी सम्मेलन के माध्यम से हमने दुनिया को हिंदी के व्यापक प्रभाव क्षेत्र के संबंध में स्पष्ट संदेश दे दिया है और विश्व मंच पर हिंदी को स्वीकार करने के लिए मज़बूत दावेदारी पेश की है। मैं आशा करता हूँ कि इस सम्मेलन में हुए विचार-मंथन से और इसमें लिए गए निर्णयों से वैश्विक स्तर पर हिंदी के प्रचार-प्रसार को गति मिलेगी I विश्‍व पटल पर हिंदी भाषा के विकास व भारतीय संस्कृति के संवर्धन एवं संरक्षण में विभिन्न देशों में बसे भारत वंशियों ने अहम योगदान दिया है । आज इस मंच से मैं उन सभी साहित्‍यकारों एवं लेखकों के प्रति आभार प्रकट करता हूं जिन्‍होंने अपनी संवेदनाओं की अभिव्‍यक्‍ति के लिए हिंदी को ही स्‍वाभाविक माध्‍यम माना और जो पूरे विश्व में निःस्वार्थ भाव से हिंदी के सिपाही बन कर सृजनात्मक कार्यों में लीन हैं I

 

  1. भारत की विकास गाथा में एक वैश्विक भाषा के रूप में हिंदी का महत्व सर्वविदित हैI पर्यटन, विज्ञान, वाणिज्य, व्यापार और मीडिया जैसे हर क्षेत्र में हिंदी का महत्व बढ़ रहा है। सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आई वर्तमान क्रांति, विशाल बाजारों की उपलब्‍धता, व्‍यापारिक अवरोधों की समाप्‍ति, प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश आदि से वैश्‍वीकरण में और भी तीव्रता आई है । भूमंडलीकरण और आर्थिक उदारीकरण के मौजूदा दौर में हिंदी ने अपने महत्‍व, प्रासंगिकता और लोकप्रियता की वजह से अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर अपनी विशेष पहचान बनाई है । हिंदी अपनी व्‍यापक पहुंच एवं लोकप्रियता तथा बाजार सम्‍मोहन क्षमता के चलते एक शक्‍तिशाली भाषा के रूप में स्‍थापित होने की राह पर अग्रसर है । बड़ी-बड़ी बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों के लिए भारत में अपना व्‍यवसाय कामयाब बनाने के लिए हिंदी का सहारा लेना व्‍यावसायिक मजबूरी है । बहुराष्‍ट्रीय कंपनियां अपने व्‍यापारिक हितों के लिए वैश्‍विक हिंदी की संकल्‍पना कर रही हैं । मीडिया एवं विज्ञापनों से भी हिंदी का बाजारीकरण हो रहा है ।

 

  1. सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में हिंदी को मजबूत बनाने के लिए राजभाषा विभाग ने जो प्रयास किए हैं, वह सराहनीय हैं I मुझे बताया गया है कि पिछले वर्ष हिंदी दिवस के शुभ अवसर पर राजभाषा विभाग द्वारा 14 भारतीय भाषाओं में हिंदी सीखने के लिए तैयार किए I

 

गए ‘लीला’ मोबाइल ऐप का लोकार्पण माननीय राष्‍ट्रपति जी के कर-कमलों से किया गया था I हिंदी का कार्यसाधक ज्ञान रखने वाले कार्मिकों तथा जन साधारण को हिंदी भाषा का उच्चतर ज्ञान देने के लिए आज लोकार्पित ‘ लीला हिंदी प्रवाह’ तैयार करने के लिए और हिंदी प्रौद्योगिकी संसाधन केंद्र की स्थापना के लिए मैं राजभाषा विभाग को बधाई देता हूँ I स्मृति आधारित अनुवाद टूल ‘कंठस्थ’ राजभाषा विभाग की महत्वकांक्षी परियोजना है जिसका लोकार्पण पिछले माह मारीशस में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन में किया गया था I मुझे आशा है कि भविष्य में भी विभाग अपने दायित्वों का निर्वहन इसी प्रकार कुशलता से करता रहेगा I

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