संदर्भ
सामग्री
ओजोन परत की सुरक्षा
के लिए वियना कन्वेन्शन
पर 22 मार्च 1985 को तथा
ओजोन परत को नुकसान
पहुंचाने वाले
पदार्थों पर मॉन्ट्रीयल
प्रोटोकॉल पर
16 सितंबर 1987 को हस्ताक्षर
किए गए थे ताकि
ओजोन परत की सुरक्षा
की जा सके। वर्ष
1995 से आज का दिन हर
वर्ष ओजोन परत
की सुरक्षा के
अंतर्राष्ट्रीय
दिवस के रूप में
मनाया जाता है
और इसी दिन मॉन्ट्रीयल
प्रोटोकॉल को भी
याद किया जाता
है। इस वर्ष मॉन्ट्रीयल
प्रोटोकॉल की
25वीं जयंती है।
इसलिए 13 सितंबर
2012 का दिन ओजोन परत
की सुरक्षा के
अंतर्राष्ट्रीय
दिवस के रूप में
मनाये जाने का
निर्णय किया गया
है।
ओजोन
परत को नुकसान
पहुंचाने वाले
पदार्थों पर मॉन्ट्रीयल
प्रोटोकॉल को अंतर्राष्ट्रीय
पर्यावरण संधि
के इतिहास में
सबसे महत्वपूर्ण
माना जाता है।
इस शानदार उपलब्धि
का दूसरा सबूत
यह है कि मॉन्ट्रीयल
प्रोटोकॉल पर सभी
देशों ने मंजूरी
दी। आज सारे देश
इस शानदार समझौते
पर हस्ताक्षर
कर चुके हैं। इस
तरह ओजोन परत को
सुरक्षित बनाने
के लिए पूरा अंतर्राष्ट्रीय
समुदाय एकजुट है।
यह
प्रोटोकॉल दशकों
के अनुसंधान के
बाद अस्तित्व
में आया। इसने
यह साबित कर दिया
कि ऐसे रसायन जिनमें
क्लोरीन और ब्रोमाइन
होते हैं उनसे
वातावरण दूषित
होता है और ओजोन
की परत को नुकसान
पहुंचता है। ओजोन
परत का क्षरण होने
से सूरज की अल्ट्रावॉयलट
(यूवी-बी) किरणे
धरती तक पहुंचती
हैं और मानव जीवजंतुओं
और पेड़ पौधों
पर नुकसानदायक
प्रभाव डालती हैं।
विश्व स्वास्थ्य
संगठन के अनुसार
प्रति वर्ष 12 से
15 मिलियन लोग पूरी
दुनिया में मोतियाबिंद
से प्रभावित होकर
अंधे हो जाते हैं।
इनमें से 20 प्रतिशत
मामले सूर्य की
किरणों से प्रभावित
होते हैं।
सटीक
नतीजों के आधार
पर आरंभ में प्रोटोकॉल
के तहत उस पर हस्ताक्षर
करने वाले सभी
देशों से आग्रह
किया गया था कि
वे ओजोन की परत
को नुकसान पहुंचाने
वाले प्रमुख पदार्थों
(ओडीएस) को धीरे-धीरे
समाप्त कर दें।
ये पदार्थ हैं
क्लोरोफ्लूरोकार्बन
(सीएफसी), हेलन्स
और कार्बन-टेट्राक्लोराइड
(सीटीसी), जिन्हें
एक निर्धारित समय
के अंदर समाप्त
करने का आग्रह
किया गया था। आगे
चलकर और अध्ययन
करने के बाद हाइड्रोक्लोरोफ्लूरोकार्बन
(एचसीएफसी) और मेथाइल-ब्रोमाइड
जैसे पदार्थों
को भी प्रोटोकॉल
में शामिल करके
उन्हें समाप्त
करने की अवधि तय
की गई।
मॉन्ट्रीयल
प्रोटोकॉल पिछले
25 सालों से प्रचलन
में है और उसे अभूतपूर्व
अंतर्राष्ट्रीय
सहयोग प्राप्त
है। इसके कारण
कई ओडीएस के उत्पादन
और खपत को चरणबद्ध
तरीके से समाप्त
कर दिया गया है।
एक जनवरी 2010 तक सीएफसी,
सीटीसी और हेलन्स
जैसे प्रमुख ओडीएस
को पूरी दुनिया
से समाप्त कर
दिया गया है। इससे
न केवल ओजोन की
सुरक्षा हुई बल्कि
ऐसा करने से जलवायु
प्रणाली को भी
बहुत लाभ पहुंचा
है। ओडीएस एक प्रकार
के ग्रीन हाउस
गैस (जीएचजी) होते
हैं और इन गैसों
को उत्सर्जन नियंत्रण
संबंधी क्योटो
परिधि में नहीं
रखा गया था। विशेषज्ञ
अनुमानों के अनुसार
एक जनवरी 2010 से जीएचजी
उत्सर्जन को
11 गीगाटन सीओ2 तक
कम कर दिया गया
है। यह ओडीएस को
धीरे-धीरे समाप्त
करने का नतीजा
है। क्योटो प्रोटोकॉल
में इसे पांच से
छह गुना कम करने
का लक्ष्य रखा
गया था जिसकी अवधि
2008-2012 तय की गई थी।
भारत
ओजोन परत की सुरक्षा
संबंधी वियना कन्वेन्शन
और ओजोन परत को
नुकसान पहुंचाने
वाले पदार्थों
संबंधी मॉन्ट्रीयल
प्रोटोकॉल का हिस्सा
है। भारत ओजोन
परत की सुरक्षा
की विश्व चिंता
का हिस्सा है
और ओडीएस को चरणबद्ध
तरीके से समाप्त
कर रहा है। इन पदार्थों
का इस्तेमाल औद्योगिक
और औषधीय वतिलयन,
रेफ्रिरेजशन और
एयरकंडीशन उपकरणों,
फोम निर्माण, अग्निशामक
उपकरणों, धातु
सफाई, कपड़ों की
सफाई आदि के लिए
किया जाता है।
वर्ष
1993 से मॉन्ट्रीयल
प्रोटोकॉल गतिविधियों
के कार्यान्वयन
के लिए जिम्मेदार
हितधारक लगातार
प्रयास करते रहे
हैं। भारत ने एक
जनवरी 2010 तक सीएफसी,
सीटीसी और हेलन्स
के उत्पादन एवं
खपत को चरणबद्ध
तरीके से सफलतापूर्वक
समाप्त कर दिया
है। केवल अस्थमा,
क्रोनिक ओब्सट्रक्टिव
पलमनेरी रोग तथा
सांस संबंधी अन्य
रोगों के इलाज
में इस्तेमाल
किए जाने वाले
मीटर्ड डोज इनहेलर
संबंधी सीएफसी
का निर्माण चल
रहा है। इसे मॉन्ट्रीयल
प्रोटोकॉल के प्रावधानों
के तहत आवश्यक
इस्तेमाल के रूप
में स्वीकार किया
गया है।
भारत
ने मॉन्ट्रीयल
प्रोटोकॉल के द्वारा
निर्धारित 17 महीने
पहले ही यानी एक
अगस्त 2008 से सीएफसी
का उत्पादन और
खपत समाप्त कर
दी है। बहरहाल
औषधीय सीएफसी की
आपूर्ति सुनिश्चित
करने के लिए आवश्यक
कदम उठाये गए हैं,
ताकि अस्थमा और
सांस के अन्य
मरीजों को प्रोटोकॉल
के प्रावधानों
के तहत इनहेलर
उपलब्ध हो सकें।
भारत को देश में
इनहेलरों के निर्माण
के लिए वर्ष 2010 में
343.6 मीट्रिक टन औषधीय
सीएफसी की अनुमति
मिली थी। भारत
के इनहेलर निर्माताओं
ने इनहेलरों के
लिए सीएफसी-मुक्त
फॉर्मूला विकसित
कर लिया है और अब
ज्यादातर सीएफसी
मुक्त इनहेलर
घरेलू बाजार में
उपलब्ध हैं। भारत
ने अब इनहेलर निर्माताओं
से परामर्श करने
के बाद यह तय किया
है कि वर्ष 2011 और उसके
बाद के लिए औषधीय
सीएफसी के निर्माण
की अनुमति नहीं
लेगा।
सीटीसी,
सीएफसी और हेलन्स
जैसे ओडीएस को
चरणबद्ध तरीके
से समाप्त करने
संबंधी मॉन्ट्रीयल
प्रोटोकॉल की सफलता
से उत्साहित होकर
सितंबर 2007 में संपन्न
हुई 19वीं बैठक में
यह तय किया गया
कि अगले दस वर्षों
में एचसीएफसी को
समाप्त कर दिया
जाएगा। एचसीएफसी
के उत्पादन और
खपत का आधार 2009 और
2010 में उसके औसत उत्पादन
और खपत को बनाया
गया है। वर्ष 2013 में
बेसलाइन स्तर
पर इसका इस्तेमाल
बंद कर दिया जाएगा।
तयशुदा अवधि के
आधार पर पहले चरण
के संबंध में 2015 में
बेसलाइन स्तर
पर दस प्रतिशत
की कमी लाई जाएगी।
एचसीएफसी
को चरणबद्ध तरीके
से समाप्त करने
के लिए उद्योग,
संबंधित औद्योगिक
संघों, अनुसंधान
संस्थानों, संगठनों,
गैर सरकारी संगठनों
आदि से परामर्श
करने के बाद एक
प्रबंधन योजना
(एचपीएमपी) तैयार
की गई थी। इन क्षेत्रों
के कार्य समूहों
की बैठक सितंबर
2009 में आयोजित की
गई थी। भारत में
एचसीएफसी को चरणबद्ध
तरीके से समाप्त
करने का कार्यक्रम
अक्तूबर 2009 में
शुरू किया गया
था। इस संबंध में
अक्तूबर 2011 में
एचसीएफसी पर हितधारकों
की दो दिवसीय कार्यशाला
आयोजित की गई थी,
ताकि इस संबंध
में रणनीति को
अंतिम रूप दिया
जा सके। एचपीएमपी
चरण-1 को मल्टीलेटरलफंड
(एमएलएफ) की कार्यकारी
समिति ने अनुमति
दी थी। यह अनुमति
समिति ने अपनी
69वीं बैठक में मॉन्ट्रीयल
प्रोटोकॉल के कार्यान्वयन
के लिए दी थी। इसकी
अवधि 2012-2015 है। इसके
तहत 2013 और 2015 में एचसीएफसी
को 341.77 ओडीपी टन तक
चरणबद्ध तरीके
से कम करने का फैसला
किया गया। इसका
शुरूआती बिंदु
1691.25 ओडीपी टन था।
भारत
सरकार ने वित्तीय
और नियामक संबंधी
कई नीतिगत उपाय
किए हैं ताकि मौजूदा
और नए उद्यमों
को नई प्रौद्योगिकियों
को अपनाने के लिए
प्रोत्साहित
किया जा सके।
मीणा/अरुण/सोनिका-239