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एनसीएओआर: ध्रुवीय प्रदेशों के लिए भारतीय प्रवेशद्वार
विशेष लेखः पर्यावरण

विशेष लेखः पर्यावरण

 

कल्पना पालकीवाला*

 

     राष्ट्रीय अंटार्कटिक एवं समुद्री अनुसंधान केंद्र (एनसीएओआर) भारतीय ध्रुवीय (आर्कटिक, अंटार्कटिक और दक्षिणी महासागर) कार्यक्रम को समन्वित और लागू करने वाली केंद्रीय एजेंसी है। देश में यह एकमात्र ऐसा संस्थान है जिसके पास ध्रुवीय प्रदेशों से हिमखंड़़ के संग्रहण और प्रसंस्करण की क्षमता है। अब तक भारत सफलतापूर्वक अंटार्कटिका के लिए 30 वैज्ञानिक अभियानों और आर्कटिक तथा दक्षिणी महासागर प्रत्येक के लिए पांच अभियानों को प्रारंभ कर चुका है। वर्ष 2010-11 में, एनसीएओआर ने दक्षिण ध्रुव के लिए सर्वप्रथम भारतीय अभियान की शुरुआत की। अंटार्कटिका में मैत्री के अलावा भारत के पास अब आर्कटिक में अनुसंधान बेस- हिमाद्रि है। पूर्वी अंटार्कटिका में नवीन अनुसंधान बेस- भारती के निर्माण का प्रथम चरण पूरा हो चुका है और संभावना है कि 2012-13 में स्टेशन को अधिकृत कर दिया जाएगा। बर्फ तोड़ने वाले एक नए ध्रुवीय अनुसंधान पोत के अधिग्रहण की प्रक्रिया उन्नत चरण में है।

      अनुसंधान कार्यक्रम में हिमखंड़ अधययन, सुदूर संवेदन, ध्रुवीय झील अधययन, जलवायु परिवर्तन अधययन, दक्षिणी महासागर प्रक्रियाओं, विशेष आर्थिक क्षेत्र सर्वेक्षण, वैध महाद्वीपीय चट्टानों का मानचित्रण, पर्यावरण प्रभाव आकलन और सूक्ष्मजैविक जैव विविधता तथा  भूजैविक रसायनशास्त्र शामिल हैं।      यह संस्थान राष्ट्रीय अंटार्कटिक आंकड़ा केन्द्र, पृथ्वी स्टेशन- मैत्री के साथ उपग्रह सम्पर्क, अंटार्कटिक प्रकाशनों के लिए अंकीय भंडार, हिमखंड प्रसंस्करण और भंडार परिसर, समुद्र विज्ञान अनुसंधान पोत- सागर कन्या, प्रयोगशाला और पुस्तकालय की सुविधा प्रदान करता है। विभिन्न गतिविधियों के लिए यह मुख्य वैज्ञानिक उपकरणों  को प्रदान करता है। ये   मौलिक विश्लेषक, आयन क्रोमोटोग्राफ, जैल प्रलेखन प्रणाली, स्कैनिंग इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी, कुल जैविक कार्बन विश्लेषक, पोलीमरेज़ चेन रिएक्शन प्रणाली, परमाणु अवशोषण स्पेक्ट्रोफोटोमीटर, स्थिर आइसोटोप अनुपात मास स्पेक्ट्रोमीटर, उच्च प्रदर्शन तरल क्रोमैटोग्राफी और उपपादन युग्गमित प्लाज्मा मास स्पेक्ट्रोमीटर  हैं।

नवीन पहल
      लरसेमन हिल्स पर भारत के तृतीय स्थायी अनुसंधान स्टेशन भारती के निर्माण का दूसरा चरण 2012-13 में पूरा होने की संभावना है। प्रथम चरण में कार्य स्थल तैयारी, निर्माण उपकरण के परिवहन, ईंधन फॉर्म की स्थापना, पेयजल और दूषित जल के लिए पाइप लाइन डालने, हेलीपैड, मुख्य स्टेशन के लिए स्तंभों का काम निर्धारित समय के अनुसार इस वर्ष पूरा कर लिया गया।

      सभी तीनों ध्रुवों (आर्कटिक, अंटार्कटिक और हिमालय) में जियोट्रेसेस और भूजैविक रसायनशास्त्र अधययन में नवीन पहल से समुद्री प्रक्रियाओँ, वैश्विक जलवायु, भूजैविक रासायनिक चक्रों और समुद्री उत्पादकता जो कि समाज के लिए बेहद महत्वपूर्ण है ताकि जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से प्रभावी ढंग से निपटा जा सके, समुद्री स्तर बढ़ने, समुद्र अम्लीकरण और समुद्री संसाधनों के सतत उपयोग का परिणाम सामने आएगा।     इन्हें 12 वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान चालू किया जाएगा। जियोट्रेसेस एक अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम है जिसका उद्देश्य  भूजैविक रासायनिक चक्रों और ट्रेस तत्वों तथा उनके आइसोटोप के समुद्री वातावरण में बड़े पैमाने पर वितरण की समझ में सुधार करना है। कार्यक्रम में लगभग 30 देशों से वैज्ञानिकों को शामिल किया गया है।  इस कार्यक्रम का ढांचा अगले दशक में सभी प्रमुख सागर घाटियों का अध्ययन करने के हिसाब से तैयार किया गया है।       क्रायोस्फीयर कार्यक्रम के अंतर्गत, एनसीएओआर ग्लेशियर विज्ञान अध्ययन की बहुशाखाओं की शुरुआत करेगा। ये बहुशाखाएं आर्कटिक, अंटार्कटिका और हिमालय के चयनित ग्लेशियरों में हिम, बर्फ, और पर्माफ्रोस्ट पर होंगी ताकि इस क्षेत्र से संबंधित ख़ासतौर पर हिम-बर्फ रसायनशास्त्र, हिमखंडों की वास्तविक उम्र और प्लेइयोक्लाइमेट अध्ययन के क्षेत्र में जानकारी के अभाव की खाई को भरा जा सके। इस अध्ययन से बहुकालिक आंकड़े प्राप्त होंगे जिससे ग्लेशियरों के स्वास्थ्य के संबंध में किसी नतीजे पर पहुंचा जा सकेगा और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का आकलन किया जा सकेगा।

      समुद्री भूभौतिकी कार्यक्रम अंडमान निकोबार क्षेत्र में तलशिला की भूवैज्ञानिक विशेषताओं, सुनामी के पश्चात विवर्तनिक परिवर्तन, हिंद महासागर के विकास, हिंद महासागर क्षेत्र में भूभौतिकीय विसंगतियों आदि के बारे में जानकारी उपलब्ध कराएगा। भारतीय अनुसंधानकर्ता जो कि ध्रुवीय क्षेत्रों में अध्ययन में जुटे हुए हैं उन्हें बेहतर उपकरण मुहैया कराने के लिए बर्फ को तोड़ने वाले एक पोत का अधिग्रहण किया जाएगा। आँकड़ों को एकत्र करने में उनकी क्षमता को बढ़ाने के लिए यह ज़रूरी है। अब तक, अपने वैज्ञानिकों को अंटार्कटिका ले जाने के लिए भार मालवाहक पोतों को किराए पर लेता था जिसकी वजह से अंटार्कटिका तक के रास्ते में कोई भी अर्थपूर्ण आंकड़ा नहीं जुटाया जा पाता था। नए पोत को लेना इसलिए भी आवश्यक है क्योंकि निकट भविष्य में भारत दो अंटार्कटिक स्टेशनों और आर्कटिक से भी संचालन करेगा।      भारत वैध महाद्वीपीय चट्टानों के दावे की प्रक्रिया में है और 60 लाख वर्ग कि.मी. के अतिरिक्त क्षेत्र के लिए दूसरा आंशिक निवेदन पहले ही प्रस्तुतिकरण की प्रक्रिया में है। लगभग 60 लाख वर्ग कि.मी. के विस्तारित वैध महाद्वीपीय चट्टानों के लिए भारत अपना प्रथम आंशिक निवेदन मई 2009 में ही प्रस्तुत कर चुका है।

      एनसीएओआर अब हेलीकाप्टरों की पहुंच से परे अंटार्कटिका के अत्यधिक दुर्गम क्षेत्रों में उच्च क़िस्म के अनुसंधान में रुचि रखने वाले वैज्ञानिकों को तार्किक और वैज्ञानिक सहायता उपलब्ध कराने की स्थिति में है। दक्षिण ध्रुव के अभियान और उसके पार अब काफी संभावनाएं हैं। इस महाद्वीप में यात्राओं के द्वारा  अंटार्कटिका के अंदरुनी हिस्सों में पर्वतों के पार मार्ग स्थापित करने से ऐसा संभव हुआ है। पृथ्वी के सुदूर छोर-दक्षिणी ध्रुव तक प्रथम प्रत्येक वैज्ञानिक अभियान से अर्जित लाभ को भविष्य में ध्रुवीय पठार तक पहुंचकर हिमखंड की गहरी खुदाई के लिए इस्तेमाल किया जाएगा।    दक्षिणी महासागर अभियान दक्षिणी गोलार्द्ध में 33 डिग्री अक्षांश के दक्षिण में महासागरों में जटिल सागर मोर्चों, जैव विविधता और भूवैज्ञानिक रासायनिक प्रक्रियाओं को समझने के लिए शुरू किया जाएगा। अभियान सभी भारतीय विश्वविद्यालयों, राष्ट्रीय संगठनों और अनुसंधान संस्थानों के लिए खुला है।
            
लंबी अवधि तक अंटार्कटिका में रहने वाले वैज्ञानिक दुनिया भर के वैज्ञानिक प्रकाशनों पर नज़र रख पाएंगे। अंटार्कटिका में संपर्क मज़बूत बनाने की वजह से ऐसा हो पाएगा। बैंड विड्थ में वृद्धि से अंटार्कटिका और भारत के बीच आँकड़ों के स्थानांतरण औऱ आवाज़ के संचारण में सुधार होगा। इसके द्वारा डेटा और अंटार्कटिका और भारत के बीच आवाज संचरण हस्तांतरण में सुधार होगा। यह डेटा स्थानांतरण की क्षमताओं को बढ़ावा देगा और वैज्ञानिकों को अद्यतन रखेगा। (पीआईबी फीचर)

 

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* उप निदेशक (एम एंड सी), पत्र सूचना कार्यालय, नई दिल्ली

 

वि‍नोद/ वि‍जयलक्ष्‍मी ‑99

पूरी सूची –18-7-2011

 

 



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