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प्रधानमंत्री कार्यालय

परम्परागत ज्ञान अंकीय पुस्‍तकालय (टीकेडीएल)-जैविक चोरी के खिलाफ परम्परागत भारतीय ज्ञान के संरक्षण का कारगर और नवीन माध्यम
वि‍शेष लेख: ज्ञान

वि‍शेष लेख: ज्ञान

-          समीर के. ब्रह्मचारी

 

      परम्परागत ज्ञान अंकीय iqLrdky; (टीकेडीएल) वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद, विज्ञान और प्रौद्योगिकी एवं पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय तथा आयुष विभाग, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय का एक सहयोगपूर्ण उद्यम तथा अंतर्राष्ट्रीय पेटेंट कार्यालयों में भारत से सम्बद्ध परम्परागत ज्ञान का गलत प्रयोग रोकने का पहला भारतीय प्रयास है। टीकेडीएल ने आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध और योग के  संस्कृत, हिंदी, अरबी, फारसी, उर्दू और तमिल में तीन करोड़ 40 लाख -4 आकार वाले पृष्ठों में संजोए परम्परागत चिकित्सकीय ज्ञान को वैज्ञानिक रूप से परिवर्तित और योजनाबद्ध करके भाषा और प्रारूप की रुकावटें मिटा दी हैं। उसने सूचना प्रौद्योगिकी के उपकरणों तथा नवीन वर्गीकरण प्रणाली-परम्परागत ज्ञान संसाधन वर्गीकरण (टीकेआरसी) की मदद से इस सामग्री का अनुवाद अंग्रेजी, जापानी, फ्रांसीसी, जर्मन और स्पेनिश जैसी पांच अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं में किया गया है। आज, भारत टीकेडीएल के माध्यम से नीम और हल्दी जैसे करीब 2.45 लाख चिकित्सकीय संरूपों को संरक्षित करने में सक्षम है। अधिगम (गोपनीयता) समझौते के तहत  आठ अंतर्राष्ट्रीय पेटेंट कार्यालयों को टीकेडीएल तक पहुंच दी गई है जिनमें यूरोपीय पेटेंट कार्यालय (ईपीओ), भारतीय पेटेंट कार्यालय, जर्मन पेटेंट कार्यालय (जीपीओ), यूनाइटेड किंगडम इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी ऑफिस (यूकेपीटीओ), यूनाइटेड स्टेट्स पेटेंट एंड ट्रेडमार्क ऑफिस (यूएसपीटीओ), कनाडियन इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी ऑफिस  (सीआईपीओ), आईपी ऑस्ट्रेलिया और जापान पेटेंट कार्यालय (जेपीओ) शामिल हैं। टीकेडीएल टीम द्वारा दाखिल तीसरे पक्ष के पर्यवेक्षण के आधार पर अब तक अमेरिका, ब्रिटेन, स्पेन, इटली, चीन आदि की औषधि निर्माता कम्पनियों के 53 आवेदन या तो खारिज किए जा चुके है या वापस ले लिए जा चुके हैं/रद्द कर दिए गए हैं या टीकेडीएल डाटाबेस में मौजूद सूचना के आधार पर  बिना किसी खर्च के और तीसरे पक्ष के पर्यवेक्षण दर्ज किए जाने के कुछ ही हफ्तों के भीतर उन्हें निष्क्रिय पेटेंट आवेदन घोषित कर दिया गया है, जबकि पेटेंट को रद्द कराने में चार से 13 साल तक कानूनी जंग लड़नी पड़ती है। गलत पेटेंट दिए जाने के मामले को टीकेडीएल द्वारा नवीन, उपयोगी और कारगर ढंग से रोके जाने पर गौर करते हुए कई देशों और संगठनों ने अपने यहां मौजूद मॉडल की जगह टीकेडीएल लागू करने की इच्छा व्यक्त की है। वैश्विक समुदाय सहित विश्व बौद्धिक सम्पदा संगठन ने बौद्धिक सम्पदा अधिकार और परम्परागत ज्ञान के क्षेत्र में भारत की अग्रणी भूमिका स्वीकार की है।

 

टीकेडीएल पहल का प्रारम्भ

      टीकेडीएल पहल की शुरूआत हल्दी के घाव भरने के गुणों का यूएसपीटीओ में तथा नीम के फफूंदी रोधी गुणों का ईपीओ में पेटेंट रद्द कराने के भारतीय प्रयासों जितनी पुरानी है। इसके अलावा, 2005 में, टीकेडीएल विशेषज्ञ समूह ने अनुमान व्यक्त किया कि हर साल अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दवाओं की भारतीय चिकित्सा प्रणालियों से सम्बद्ध करीब 2000 गलत पेटेंट प्रदान किए जाते हैं। इसकी मुख्य वजह यह है भारत का परम्परागत चिकित्सकीय ज्ञान संस्कृत, हिंदी, अरबी, फारसी, उर्दू, तमिल आदि भाषाओं में था, जो अंतर्राष्ट्रीय पेटेंट कार्यालयों के पेटेंट जांचकर्ताओं के लिए तो सुलभ था और ही बोधगम्य।

      अमेरिका और यूरोप में ये पेटेंट्स प्रदान किया जाना राष्ट्रीय स्तर पर बहुत दुख का कारण बना। तभी से हर भारतीय को महसूस होने लगा कि भारत का ज्ञान गलत तरीके से उससे छीन लिया गया है। इसके अलावा पेटेंट प्रदान करने वाले देश में, पेटेंट के आवेदक को प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल के अलग से अधिकार प्राप्त हो जाते थे।

 

टीकेडीएल ने परम्परागत ज्ञान पर भाषा और अधिगम की सीमाएं तोड़ीं

      टीकेडीएल ने तीन करोड़ 40 लाख -4 आकार वाले पृष्ठों में संस्कृत, हिंदी, अरबी, फारसी, उर्दू और तमिल में संजोए गए परम्परागत चिकित्सकीय ज्ञान को वैज्ञानिक रूप से परिवर्तित और योजनाबद्ध करके भाषा और प्रारूप की रुकावटें दूर कर दी हैं। उसने सूचना प्रौद्योगिकी के उपकरणों तथा नवीन वर्गीकरण प्रणाली-परम्परागत ज्ञान संसाधन वर्गीकरण (टीकेआरसी) की मदद से इस सामग्री का अनुवाद अंग्रेजी, जापानी, फ्रांसीसी, जर्मन और स्पेनिश जैसी पांच अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं में किया गया है। आज, भारत टीकेडीएल के माध्यम से नीम और हल्दी जैसे करीब 2.45 लाख चिकित्सकीय संरूपों को संरक्षित करने में सक्षम है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रदान किए गए किसी पेटेंट का विरोध करने में औसतन पांच से सात वर्ष लगते हैं, जिस पर एक से तीन करोड़ रुपये खर्च हो सकते हैं। टीकेडीएल की गैर मौजूदगी में 2.45 लाख चिकित्सकीय संरूपों के संरक्षण में होने वाले खर्च की सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है।

 

परम्परगत ज्ञान संसाधन वर्गीकरण-परम्परागत ज्ञान की संरचना का एक नवीन तंत्र

      टीकेडीएल परियोजना के तहत परम्परगत ज्ञान से सम्बद्ध विषयवस्तु के वर्गीकरण के लिए भारत द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पेटेंट वर्गीकरण (आईपीसी) की संरचना के आधार पर एक वर्गीकरण प्रणाली यानी  परम्परागत ज्ञान संसाधन वर्गीकरण (टीकेआरसी) बनाई गई है जिसमें आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध और योग के लिए तकरीबन 27,000 उपसमूह हैं। टीकेआरसी के गठन का उद्देश्य सिर्फ भारतीय परम्परागत चिकित्सा का संरचनात्मक वर्गीकरण करना था बल्कि उसका एक संक्षिप्त एवं रोग निवृत्ति माध्यम के रूप में इस्तेमाल करना भी था।

 

 

अंतर्राष्ट्रीय पेटेंट वर्गीकरण पर टीकेआरसी का प्रभाव

      टीकेडीएल, अंतर्राष्ट्रीय पेटेंट वर्गीकरण (आईपीसी) के सुधार के लिए उत्तरदायी रही है। इसने परम्परागत ज्ञान पर आईपीसी एक उपसमूह से बढ़ाकर 207 उपसमूह कर दिया जिससे वह परम्परागत ज्ञान के विषय से सम्बद्ध पेटेंट आवेदनों की कारगर पड़ताल और परीक्षण प्रणाली में सक्षम हो सका। अंतर्राष्ट्रीय पेटेंट प्रणाली में परम्परागत ज्ञान के संदर्भ में आईपीसी सुधार बुनियादी सुधार हैं जिनका दीर्घकालिक प्रभाव होगा।

 

टीकेडीएल ने परम्परागत ज्ञान धारक (धारकों) के ज्ञान और अंतर्राष्ट्रीय पेटेंट परीक्षकों के फासले, प्रारूप और भाषाओं की वर्जनाएं तोड़ीं

      टीकेडीएल स्वामित्व सम्पन्न और मौलिक डाटाबेस है। टीकेडीएल भारतीय चिकित्सा प्रणालियों की 148 पुस्तकों पर आधारित है, जो 50,000 रुपये मूल्य पर उपलब्ध हैं। ये पुस्तके पूर्ववर्ती कला हैं और राष्ट्रीय/अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर किसी भी व्यक्ति/संगठन द्वारा स्रोत बनायी जा सकती हैं। टीकेडीएल इन पुस्तकों और अंतर्राष्ट्रीय पेटेंट परीक्षकों के बीच पुल का कार्य करती हैं। टीकेडीएल प्रौद्योगिकी की बदौलत ईपीओ या किसी भी अंतर्राष्ट्रीय पेटेंट कार्यालय में परीक्षक द्वारा अपनी कम्प्‍यूटर  स्क्रीन पर संस्कृत के श्लोक को जर्मन, जापानी, अंग्रेजी, स्पेनिश और फ्रेंच जैसी भाषाओं में पढ़ने का एक अनूठा तंत्र विकसित किया गया है।

 

टीकेडीएल (गोपनीयता) अधिगम समझौते के तहत टीकेडीएल तक पहुंच

      टीकेडीएल (गोपनीयता) अधिगम समझौते के तहत अंतर्राष्ट्रीय पेटेंट कार्यालय को टीकेडीएल तक पहुंच उपलब्ध कराई गई है। इस समझौते के तहत, पेटेंट कार्यालय के परीक्षक सिर्फ पड़ताल और परीक्षण उद्देश्यों के लिए टीकेडीएल का इस्तेमाल कर सकते हैं और टीकेडीएल की विषयवस्तु का खुलासा किसी तीसरे पक्ष के समक्ष तब तक नहीं कर सकते जब तक दृष्टांत के लिए ऐसा किया जाना आवश्यक हो। टीकेडीएल अधिगम समझौते की प्रकृति अनूठी है और भारतीय हितों की रक्षा के लिए किसी भी सम्भावित गलत इस्तेमाल को रोकने के वास्ते उसमें गोपनीयता संरक्षण निहित है।

      भारत ने (1) यूरोपीय पेटेंट कार्यालय (ईपीओ) के साथ (फरवरी 2009 में), (2)यूनाइटेड स्टेट पेटेंट एवं ट्रेडमार्क कार्यालय के साथ (नवम्बर 2009 में) (प्रधानमंत्री की आधिकारिक अमेरिका यात्रा के दौरान), (3)भारतीय पेटेंट कार्यालय के साथ (जुलाई 2009 में), (4)कनाडियन बौद्धिक सम्पदा कार्यालय के साथ (सितम्बर 2010 में),(5)जर्मन पेटेंट कार्यालय के साथ (अक्टूबर 2009 में),(6) यूनाइटेड किंगडम पेटेंट कार्यालय के साथ (फरवरी 2010 में), इंटलेक्चुअल प्रॉपर्टी ऑस्ट्रेलिया के साथ (जनवरी 2011 में)  और जापान पेटेंट कार्यालय के साथ (अप्रैल 2011 में) टीकेडीएल अधिगम समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं।

 

परम्परगत ज्ञान के संरक्षण के लिए टीकेडीएल पड़ताल और रोगनिवृत्ति क्षमताएं

      टीकेडीएल एक ऐसा डाटाबेस है जिसने में अपनी कारगरता साबित की है और जो विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय पेटेंट कार्यालयों में तीसरे पक्ष का पर्यवेक्षण दाखिल करके सैकड़ों पेटेंट आवेदनों का विरोध करने में कामयाब रहा है। ज्यादातर देशों के राष्ट्रीय पेटेंट कानूनों में यह प्रावधान है किसी भी व्यक्ति द्वारा पेटेंट कार्यालय में किसी भी आधुनिक/पूर्ववर्ती कला पर किसी पेटेंट आवेदन के प्रकाशित होने के बाद और पेटेंट प्रदान करने से पूर्व पेटेंट आवेदन की विलक्षणता और स्पष्टता पर प्रश्न उठाते हुए निवेदन किया जा सकता है। अंतर्राष्ट्रीय पेटेंट कार्यालयों में पेटेंट को चुनौती देना लम्बी और खर्चीली प्रक्रिया है। मिसाल के तौर पर मैक्सिको 10 साल से भी ज्यादा लम्बी कानूनी लड़ाई के बाद जुलाई 2009 में यूएसपीटीओ में एनोला बीन पर पेटेंट रद्द कराने में कामयाब हो सका। इसी तरह 13 साल की कानूनी लड़ाई के बाद ईपीओ में मोनसोनटो सोयाबीन पेटेंट को जुलाई 2007 में रद्द कराया जा सका। भारत दुनिया का अकेला देश है, जिसने अपने परम्परागत ज्ञान की रक्षा के लिए एक संस्थागत तंत्र (टीकेडीएल) विकसित किया है और गलत पेटेंट दिया जाना रोकने में सक्षम रहा है। टीकेडीएल बिना किसी खर्च के और चंद सप्ताहों के भीतर ही भारत के परम्परागत ज्ञान से सम्बद्ध गलत  पेटेंट आवेदनों को रद्द कराने/वापस कराने में सक्षम बनाता  है। इसके एकदम विपरीत, टीकेडीएल की अनुपस्थिति में ईपीओ में फंफूदरोधी गुणों के लिए नीम का पेटेंट रद्द कराने में 10 साल (1995-2005)लग गये थे।

 

जैव-चोरी के खिलाफ टीकेडीएल का प्रभाव

      पिछले दो वर्षों में पहले से ही महत्वपूर्ण प्रभाव महसूस किया गया है। जुलाई 2009 से लेकर, टीकेडीएल दल ने 571 तीसरे पक्ष के पर्यवेक्षण दाखिल किए हैं जिनमें से अमरीका, ब्रिटेन, स्पेन, इटली और चीन आदि की औषधि निर्माता कम्पनियों के 53 पेटेंट आवेदन टीकेडीएल डाटाबेस में मौजूद सूचना के आधार पर या तो खारिज कर दिए गए हैं या वापस लिए/रद्द किए गए हैं या निष्क्रिय पेटेंट आवेदन घोषित कर दिए गए हैं।

 

टीकेडीएल: अन्य देशों के लिए मॉडल

      नवीनता, उपयोगिता और गलत पेटेंट दिलाने से रोकने में इसकी कारगता को देखते हुए दक्षिण अफ्रीका, मंगोलिया, थाईलैंड, मलेशिया, एआरआईपीओ, नाइजीरिया, इंडोनेशिया आदि जैसे बहुत से देशों और संगठनों ने अपने देश में मौजूद मॉडल को टीकेडीएल से बदलने की इच्छा जाहिर की है। वैश्विक समुदाय सहित विश्व बौद्धिक सम्पदा संगठन (डब्ल्यूआईपीओ)ने बौद्धिक सम्पदा के अधिकार और परम्परागत ज्ञान के क्षेत्र  में भारत की अग्रणी भूमिका स्वीकार की है। परम्परागत ज्ञान के संरक्षण के मॉडल के रूप में भारत द्वारा स्थापित टीकेडीएल के उपयोग पर डब्ल्यूआईपीओ ने सीएसआईआर के सहयोग से नई दिल्ली में मार्च 2011 में एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया था। इस सम्मेलन में समृद्ध परम्परागत ज्ञान वाले 35 देशों ने हिस्सा लिया था। ताकि वे टीकेडीएल के गठन की प्रक्रिया समझ सकें और अपने देश के परम्परागत ज्ञान के संरक्षण के लिए ऐसे किसी मॉडल को लागू कर सकें।

***

*             महानिदेशक, वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद तथा सचिव, वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान विभाग

 

पंत@वि‍नोद/रीता/राकेश - 135  



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