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विशेष सेवा और सुविधाएँ

कि‍सानों के लि‍ए कृषि मौसम सलाह सेवा
वि‍शेष लेख

वि‍शेष लेख

सरि‍ता बरारा **

      कि‍सानों के फायदे के लि‍ए भारतीय मौसम वि‍भाग ने आजादी से पहले 1945 में ही मौसम भवि‍ष्‍यवाणी सेवा शुरू कर दी थी। आकाशवाणी से इसका प्रसारण कि‍सानों के लि‍ए मौसम बुलेटि‍न के रूप में कि‍या जाता था। आकाशवाणी से प्रसारि‍त होने वाला कृषि‍दर्शन कार्यक्रम ही काफी लम्‍बे समय तक देशभर के कि‍सानों के लि‍ए सूचना का एकमात्र जरिया था। यह कार्यक्रम इतना लोकप्रि‍य हो गया था कि‍धान की एक कि‍स्‍म का नाम रेडि‍यो धान रख दि‍या गया। लेकि‍न समय काफी बदल चुका है। कि‍सानों की स्‍थि‍ति‍तेजी से बदल रही है और सूचना प्रौद्योगि‍की क्षेत्र में क्रांति‍के साथ ही कि‍सानों तक अनेक माध्‍यमों से सूचना पहुंच रही है। मोबाइल पर एसएमएस और वॉयस मैसेज कि‍सानों तक जानकारी पहुंचाने की नवीनतम तकनीक है। कृषि‍मौसम वैज्ञानि‍क ए के सिंह के अनुसार इस सेवा से 25 लाख कि‍सान लाभान्वित हो रहे हैं।

     दि‍ल्‍ली के नजदीक नि‍जामपुर गांव के एक कि‍सान वि‍कास का कहना है कि‍वह गाजर के बीज बोने ही वाला था कि‍तभी उसे भारी बारिश होने के बारे में एसएमएस मि‍ला और उसने बुवाई का काम टाल दि‍या। अगर वह योजना के अनुसार अपने काम में आगे बढ जाता और उसे यह संदेश मिलता तो उसे 25 हजार रुपये का नुकसान हो जाता और उसकी सारी मेहनत बेकार जाती।

     दि‍ल्‍ली के नजदीक एक अन्‍य गांव पल्‍ला के कि‍सान सुरेन्‍द्र ने धान की फसल की सि‍चाई करने का फैसला कि‍या। उसे एक-दो दि‍न में बारि‍श होने का एसएमएस मि‍ला और उसने सि‍चाई का काम टाल दि‍या। इस संदेश ने सिंचाई में खर्च होने वाली बि‍जली की बचत कर दी।

     बुलंदशहर के नेकपुर गांव के एक कि‍सान ने बताया कि‍वह सि‍तम्‍बर में उर्वरकों का छि‍ड़काव करने की योजना बना रहा था कि उसे अगले दो दि‍न के भीतर बारि‍श होने संबंधी एसएमएस मि‍ला। उसने खेती से जुड़े अन्‍य वि‍षयों पर ध्‍यान देना उचि‍त समझा। अगर उसने इस संदेश की अनदेखी की होती तो उसका सारा उर्वरक बारि‍श में बह गया होता।

 

कृषि‍मौसम एसएमएस क्‍या है?

    कृषि‍मौसम एसएमएस 160 से कम अक्षरों में कि‍सानों को मौसम की भवि‍ष्‍यवाणी और कृषि‍संबंधी अन्‍य विषयों की जानकारी प्रदान करता है। इसकी वि‍षय वस्‍तु स्‍थानीय स्‍थि‍ति‍यों और जरूरतों के मुताबि‍क होती है। यह सलाह सप्‍ताह में दो बार भेजी जाती है और कि‍सान अपनी स्‍थानीय भाषा में इसे प्राप्‍त करते हैं।

     अनेक हितधारक जैसे पृथ्‍वी वि‍ज्ञान मंत्रालय, कृषि‍मंत्रालय और दूरसंचार कंपनि‍यां इस नए और उन्‍नत कार्य को शुरू करने के लि‍ए एकजुट हो गईं हैं। कि‍सानों को मोबाइल फोन के जरि‍ए कृषि‍संबंधी जानकारी प्रदान करने के लि‍ए 2009 में इफको कि‍सान संचार लि‍मि‍टेड (आईकेएसएल)की शुरूआत की गयी। इसके लिए एक स्‍थानीय सहायक हेल्‍पलाइन सहि‍त उनकी स्‍थानीय भाषा में वॉयस आधारि‍त टेक्‍नोलॉजी का इस्‍तेमाल कि‍या गया।   मूल सामग्री देशभर में स्‍थि‍त 130 फील्‍ड इकाइयों में तैयार की गयी है। इन फील्‍ड इकाइयों में विभिन्‍न कृषि विषयों से जुड़े विशेषज्ञ शामिल हैं। प्रत्‍येक इकाई में 50 से 100 ऐसे किसान हैं जो अपनी प्रतिक्रिया देते रहते हैं।

 

पांच स्‍तर वाली प्रणाली  कृषि मौसम सूचना प्रसार के लिए पांच स्‍तर वाली प्रणाली मौजूद है।1.      पृथ्‍वी विज्ञान मंत्रालय इसका नोडल मंत्रालय है।2. भारत मौसम विभाग मुख्‍यालय मौसम की पूर्व सूचना देने का मुख्‍य स्रोत है। भारत मौसम विभाग ने 1976 में सम्‍बन्धित राज्‍य सरकारों के साथ मिलकर कृषि-मौसम कृषक सलाह सेवा (एएएस) अपने राज्‍य मौसम केन्‍द्रों से शुरू की। बाद में विभिन्‍न संगठनों/संस्‍थानों के साथ मिलकर 2007 में सम्‍बन्धित कृषि मौसम सेवा अपनाई गई। वर्तमान में राष्‍ट्रीय, राज्‍य तथा जिला स्‍तर पर बुलेटिन जारी किए जा रहे हैं।   भारत मौसम विभाग, कृषि विश्‍वविद्यालयों तथा अनुसंधान संस्‍थानों के सहयोग से देश में कृषि मौसम वेधशालाओं के नेटवर्क का संचालन करता है। यह प्रभाग सहयोगी संस्‍थानों को स्‍थल चयन, कार्मिकों के प्रशिक्षण, उपकरणों के अंशांकन तथा उनके अनुरक्षण, आंकड़ों की जांच आदि में तकनीकी सहायता प्रदान करता है। इसके अलावा वाष्‍पीकरण, वाष्‍पन-उत्‍सर्जन, मिट्टी की नमी और ओस पड़ने पर इसकी अपनी वेधशालाएं नजर रखती हैं। केन्‍द्रीय कृषि मौसम वेधशाला, पुणे और बंगलौर, आणंद और रहूरी स्थित कृषि मौसम वेधशालाओं में अनेक ऐसे विशेष यंत्र और सुविधाएं जुटाई गई हैं जो अनुसंधान में काम आती हैं।

     कृषि मौसम प्रभाग फसल मौसम कैलेंडर तैयार करता है, जिसके जरिए सामान्‍य मौसम परि‍स्थितियों में फसलों की स्थिति और विभिन्‍न चरणों में फसलों की वृद्धि में बाधक मौसम सम्‍बन्‍धी तत्‍वों का समावेश होता है। फसल मौसम कैलेंडर समय-समय पर तब संशोधित कर दिए जाते हैं, जब नई फसलों की किस्‍में शुरू की जाती हैं और फसल बोने के तरीकों में परिवर्तन लाए जाते हैं।

3.   क्षेत्रीय मौसम केन्‍द्रों की पांच स्‍तरों वाली व्‍यवस्‍था की तीसरी कड़ी है-

     वह स्‍थानीय सूचनाएं और परिस्थितियां शामिल करके मौसम की भविष्‍यवाणी में मूल्‍यवर्धन करते हैं।

 

4. कृषि मौसम फील्‍ड यनिटें यह सचमुच ही बहुत महत्‍वपूर्ण कड़ी है। इसी स्‍तर पर किसानों को भेजने के लिए संक्षिप्‍त नोट तैयार किए जाते हैं। स्‍थानीय विनिर्दिष्‍ट मौसम की भविष्‍यवाणी के अलावा सिंचाई, बुवाई, कीटनाशकों के इस्‍तेमाल, उर्वरकों और बीजों की अगाऊ या देर से होने वाले बागानों और फसल कटाई के बारे में संक्षिप्‍त सलाह भी भेजी जाती है। ये सलाहें स्‍थानीय परिस्थ्‍िातियों और जरूरतों के अनुकूल होती हैं।

5. दूरसंचार कंपनियां अनेक दूरसंचार कंपनियों ने स्‍थानीय भाषाओं में पंजीकृत किसानों तक सूचनाएं पहुंचाने के प्रबंध किए हैं। यहां पर यह उल्‍लेखनीय है कि सिर्फ 10 से 15 प्रतिशत तक किसान इन एसएमएस सेवाओं का लाभ उठा पा रहे हैं। अधिकांश किसानों तक यह सूचनाएं और सेवाएं पहुंचाने में अभी काफी समय लग जाएगा।

     देश के विभिन्‍न क्षेत्रों में खोले गए करीब 600 कृषि विज्ञान केन्‍द्रों से किसान यह सूचनाएं प्राप्‍त कर सकें, इसके लिए भारत सरकार के कृषि मंत्रालय ने देशभर में बहुत से कृषि विज्ञान केन्‍द्र स्‍थापित किए हैं जो किसानों को आसानी से सूचनाएं देने के लिए काम करते हैं। कृषि विज्ञान केन्‍द्र खेती, पशुपालन और इससे जुड़े हुए क्षेत्रों से सम्‍बन्धित नई टैक्‍नोलॉजी का प्रचार-प्रसार आकाशवाणी और दूरदर्शन का इस्‍तेमाल करके करता है। साथ ही, फार्म स्‍कूलों, किसानों के लिए फोन-इन कार्यक्रम आदि की भी मदद ली जाती है।

·   किसान कृषि विज्ञान केन्‍द्रों को पत्र लिखकर अथवा अपनी समस्‍याओं के बारे में एसएमएस भेजकर समय से उनका उत्‍तर प्राप्‍त कर सकते हैं।

·   किसान काल केन्‍द्रों से फोन सुविधाओं के जरिए 1800-180-1551 नम्‍बर पर फोन करके भी सूचनाएं प्राप्‍त कर सकते हैं। हैल्‍पलाइन नम्‍बर है-0581-230111111 कृषि विज्ञान केन्‍द्र का लैंडलाइन टेलीफोन नम्‍बर है-0581-2301181

·   कृषि विज्ञान केन्‍द्रों पर किसान वैज्ञानिकों के साथ मिल बैठकर प्रश्‍न पूछ सकते हैं और कृषि, पशुपालन और अन्‍य जुड़े हुए विषयों के बारे में परामर्श प्राप्‍त कर सकते हैं। वह सूचनाएं और तकनीकी विकल्‍प हासिल कर सकते हैं।

·   किसान ताजा-तरीन वैज्ञानिक तकनीकों के बारे में अपने खेतों पर प्रदर्शन और परीक्षण भी देख सकते हैं।

 

कृषि मौसम सेवाओं का प्रभाव   विभिन्‍न माध्‍यमों से कृषि मौसम परामर्श सेवाओं के परिणाम स्‍वरूप खेती की उत्‍पादकता में वृद्धि हुई है, जिसका नतीजा है कि अनाज की उपलब्‍धता और किसानों की कमाई बढ़ गई है।

     किसानों को सिर्फ फसलों की पैदावार बढ़ाने में ही नहीं बल्कि बदलते मौसम और अन्‍य समस्‍याओं के चलते होने वाले नुकसान में भी कमी आई है।

     कृषि मौसम सेवाओं के कारण हुए आर्थिक लाभ करोड़ों में गिने जाएंगे। पृथ्‍वी विज्ञान मंत्रालय ने मौसम एवं समुद्री सेवाओं के प्रभाव आकलन और आर्थिक लाभों के बारे में व्‍यापक अध्‍ययन करने के लिए राष्‍ट्रीय व्‍यावहारिक आर्थिक अनुसंधान परिषद (एनसीएईआर) के साथ सम्‍पर्क किया है। सितम्‍बर और अक्‍तूबर 2010 में यह अध्‍ययन किया गया और अंतिम प्रमुख उपभोक्‍ता यानि किसानों तक ही कृषि मौसम सलाह सेवाओं को सीमित कर दिया गया। यह फील्‍ड अध्‍ययन 12 राज्‍यों और एक केन्‍द्र शासित प्रदेश में किया गया।

     पता चला कि अनुमानित आर्थिक लाभ रुपये 50,000 करोड़ (जहां 24 प्रतिशत किसानों को मौसम सम्‍बन्‍धी सूचनाएं मिलीं) से लेकर 211,000 करोड़ (जहां सभी किसानों को मौसम सम्‍बन्‍धी सूचनाएं प्राप्‍त हुईं) तक हुए। इससे स्‍पष्‍ट होता है कि आर्थिक प्रतिफल लाभान्वित होने वाले किसानों की संख्‍या पर निर्भर करता है।

     यही कारण है कि यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि सभी लघु, गुजारे वाले और बड़े किसानों को कृषि मौसम सलाह सेवाओं से होने वाले लाभ उपलब्‍ध कराए जाएं। इसमें कोई शक नहीं कि ऐसा करने से फसलों की पैदावार ही नहीं बढ़ेगी बल्कि किसानों की आमदनी और कमाई भी बढ़ेगी और उन्‍हें अंतत: परिस्थितियोंवश जो नुकसान होता है उसमें कमी आएगी। अगर यह मूल सुविधा न होती तो बड़ी मात्रा में मांग बढ़ाने का काम करना पड़ता जो सचमुच ही सरकार और अन्‍य हितधारकों के लिए एक बड़ी चुनौती साबित होगी।

 

**लेखि‍का स्‍वतंत्र पत्रकार हैं।इस लेख में व्‍यक्‍त विचार लेखि‍का के हैं और पत्र सूचना कार्यालय को उनके विचारों से सहमत होना आवश्‍यक नहीं।

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वि.कासोटिया/कविता/यादराम/शुक्‍ल/दयाशंकर/राजेश-200

पूरी सूची-31.10.2011



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