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ई-न्यायालय व्यवस्था की दिशा में बढ़ते कदम
वि‍शेष लेख

वि‍शेष लेख

                                                        --अनूप भटनागर*

 

                विभिन्न अदालतों में लंबित मुकदमों की बढती संख्या से प्रभावकारी ढंग से निपटने, वादियों उनके अदालती मामलों से जुड़ी आवश्‍यक सूचनाएं तत्परता से उपलब्ध कराने, न्यायाधीशों को कानूनी बिन्दुओं से जुडी न्यायिक-व्यवस्थाएं और आंकड़े सहजता से उपलब्ध कराने तथा समूची न्याय-प्रणाली को गति प्रदान करने के लिए न्यायालयों के कम्प्यूटरीकरण की दिशा में दो दशक पूर्व प्रयास शुरू किए गए थे। न्यायालयों के कम्प्यूटरीकरण का ही नतीजा है कि आज उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के साथ ही कई जिला अदालतों में ई-न्यायालय व्यवस्था भी सफलतापूर्वक काम कर रही है। देश के दूर-दराज इलाकों में रहने वाले लोग अपने किसी भी मुकदमे की प्रगति और स्थिति के बारे में सिर्फ अदालत की वेबसाइट पर एक क्लिक करके ही अपेक्षित जानकारी घर बैठे प्राप्त कर पा रहे हैं।

            ई-न्यायालय के महत्व को महसूस करते हुए जुलाई 2004 में तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश ने न्यायपालिका के कम्प्यूटरीकरण के लिए देशव्यापी नीति तैयार करने के लिए ई-कमेटी के गठन के बारे में केन्द्र सरकार को पत्र लिखा था। केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने दिसंबर 2004 में इस पत्र पर कार्यवाही करते हुए देश के प्रधान न्यायाधीश के महत्वाकांक्षी और न्यायिक व्यवस्था में सुधार के इस दीर्घकालीन प्रस्ताव को मंजूरी दी। विधि एवं न्याय मंत्रालय ने इसके बाद कर्नाटक उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश डॉ. जी. सी. भरूका की अध्यक्षता में ई-कमेटी के गठन की अधिसूचना जारी कर दी थी। केन्द्र सरकार की इस अधिसूचना के साथ ही ई-न्यायालय व्यवस्था की दिशा में काम शुरू हो गया।

            न्यायमूर्ति भरूका की अध्यक्षता वाली ई-कमेटी ने मई, 2005 में भारतीय न्यायपालिका में सूचना और संचार प्रोद्योगिकी लागू करने की योजना के बारे में अपनी रिपोर्ट प्रधान न्यायाधीश को सौंपी जिसमें न्यायपालिका में सूचना और संचार प्रौद्योगिकी लागू करने के प्रारूप को रेखांकित किया गया था। ई-कमेटी की इस रिपोर्ट के आधार पर ही न्यायपालिका में कम्प्यूटरीकरण और सूचना प्रौद्योगिकी लागू करने की देशव्‍यापी योजना तैयार हुई।

            रिपोर्ट में न्यायिक पोर्टल और ई-मेल सेवा, सहजता से इस्तेमाल होने वाले सॉफ्टवेयर उपकरण, न्यायाधीशों और अदालत के प्रशासनिक कर्मचारियों के लिए प्रशिक्षण, सूचना प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल के दौरान आने वाली समस्याओं से निपटने के लिए अदालत परिसर में प्रशिक्षित स्टाफ की उपस्थिति के लिए एक अलग काडर बनाने, उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय परिसरों में मौजूद संरचना को अपग्रेड करने, समूचे रिकॉर्ड  के लिए डिजिटल संग्रह तैयार करने और तमाम लॉ-पुस्तकालयों को कम्प्यूटर-नेटवर्क से जोड़ने जैसे कार्यों को अमली जामा पहनाने की प्रक्रिया शुरू की गई।

            देश की न्यायपालिका के कम्प्यूटरीकरण की दिशा में 1990 से ही प्रयास हो रहे थे। सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों को कम्प्यूटर प्रणाली से परस्पर जोड़ा जा रहा था। लेकिन इन प्रयासों ने 2001 से गति पकड़ी। 2001-03 के दौरान चार महानगरों दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई में सात सौ अदालतों का कम्प्यूटरीकरण किया गया। इसके बाद 2003-04 में राज्यों की राजधानियों और केन्द्र शासित प्रदेशों के 29 शहरों की नौ सौ अदालतों के कम्प्यूटरीकण का कार्य शुरू हुआ।

            न्यायपालिका के कम्प्यूटरीकरण के संतोषजनक नतीजे सामने आने पर मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति ने फरवरी 2007 में अदालतों में लंबित मुकदमों के निपटारे को गति प्रदान करने, मुकदमे के वादियों को सूचना उपलब्ध कराने में पारदर्शिता सुनिश्चित करने और न्यायाधीशों को न्यायिक प्रक्रिया से जुडे आंकडे़ तथा जानकारियां सहजता से उपलब्ध कराने के इरादे से 441.08 करोड़ रूपए की ई-न्यायालय मिशन मोड  परियोजना को मंजूरी दी।

            ई-न्यायालय मिशन मोड परियोजना के अंतर्गत जिला और अधीनस्थ अदालतों का कम्प्यूटरीकरण और उच्चतर न्यायालयों में सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी की आधारीय संरचना को अधिक सुदृढ बनाना था। सरकार ने सितंबर 2010 में इस परियोजना के लिए निर्धारित रकम में संशोधन करके इसे 935 करोड़ रूपए कर दिया था। इस वृद्धि का मकसद  न्यायालय परिसरों और न्यायालयों की संख्या में वृद्धि करना, उत्पादों और सेवाओं की दरों में वृद्धि करना और क्षेत्राधिकार में वृद्धि तथा नई मदों को इसमें शामिल करना था। इसके बाद ई-न्यायालय परियोजना के दायरे में न्यायालय परिसरों की संख्या 2,100 से बढकर 3,069 अर्थात ऐसी अदालतों की संख्या 13,000 से बढकर 14,249 हो गई।

            इस परियोजना के अंतर्गत देश के पहले कागजरहित ई-न्यायालय ने फरवरी 2010 में दिल्ली के कड़कड़डूमा अदालत परिसर में काम करना शुरू किया था। ई-न्यायालय में न्यायाधीश के समक्ष मुकदमों की मोटी फाइलें नहीं बल्कि लैपटॉप होता है।

            सरकार के इन महती प्रयासों के नतीजे अब सामने आने लगे हैं। इस समय उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में ही नहीं बल्कि निचली अदालतों में भी कम्प्यूटरीकरण और सूचना प्रौद्योगिकी लागू करने की महत्वाकांक्षी देशव्‍यापी योजना बेहद असरदार ढंग से काम कर रही है।

            इस परियोजना के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय और देश के 20 उच्च न्यायालयों में कम्प्यूटर्स, प्रिंटर्स, स्कैनर्स, सर्वर, नेटवर्किग उपकरण और नेटवर्क केबलिंग और व्यवधान रहित बिजली आपूर्ति जैसे उपाय करके सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी पर आधारित संरचरना को अपग्रेड किया जा चुका है। इस काम पर अब तक 41.47 करोड रूपए खर्च किये जा चुके हैं। यही नहीं, अब जम्मू कश्‍मीर, गुवाहाटी, राजस्थान और कलकत्ता उच्च न्यायालयों में वीडियो कांफ्रेसिंग सुविधा भी उपलब्ध कराई गई है।

            केन्द्र सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल और न्यायपालिका में प्रशासनिक सुधारों पर निगाह रखने के लिए बनी ई-कमेटी की कमान देश के प्रधान न्यायाधीश के हाथ में सौंपी है। इस समिति में न्यायिक अधिकारियों और सूचना प्रौद्योगिकी के विशेषज्ञों के अलावा अटॉर्नी जनरल और कुछ वरिष्ठ अधिवक्ताओं को भी शामिल किया गया है।

            सरकार ने भारतीय न्यायपालिका में प्रौद्योगिकी की देशव्यापी नीति पर ई-कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर तैयार ई-न्यायालय परियोजना को पांच साल में लागू करने के लिए इसे तीन चरणों में बांटा था। पहले चरण में 854 करोड़ रूपए खर्च करके सभी 2,500 अदालत परिसरों में कम्प्यूटर कक्ष और न्यायिक सेवा केन्द्रों की स्थापना हुई। करीब 15,000 न्यायिक अधिकारियों को लैपटॉप उपलब्ध कराने और तालुका स्तर से लेकर उच्चतम न्यायालय तक सभी अदालतों को डिजिटल इंटरकनेक्टीविटी से जोड़ने और उच्चतम न्यायालय तथा सभी उच्च न्यायालयों में ई-फाइलिंग सुविधा शुरू करने का लक्ष्य रखा गया था। दूसरे चरण में फाइलिंग की प्रक्रिया से लेकर इसके कार्यान्वयन स्तर तक की सारी न्यायिक प्रक्रिया के साथ ही प्रशासनिक गतिविधियों को सूचना और संचार प्रौद्योगिकी के दायरे में लाने तथा तीसरे चरण में अदालतों और सार्वजनिक प्रतिष्ठानों तथा विभागों के बीच सूचना के सहज प्रवाह को सुनिश्चित बनाने का लक्ष्य रखा गया था।

            इस परियोजना के कार्यान्वयन से जहां न्यायिक प्रक्रियाओं को गति प्रदान करने,  मामलों के तेजी से निपटान को सुविधाजनक बनाने मे मदद मिल रही है वहीं मुकदमों की स्थिति, वादियों को मामले पर हुए निर्णय के बारे मे बार के सदस्यों तथा व्यक्तियों को पारदर्शी तरीके से सूचना मिलना संभव हो सका है।

            ई-न्यायालय सेवा के जरिए न्यायालय में मुकदमों के प्रबंधन की प्रक्रिया को आटोमेशन मोड में डाला गया। इस सेवा के दायरे में मुकदमों को फाइल करना, मामलों की जांच पडताल, मामलों का पंजीकरण, मामले का आबंटन, अदालत की कार्यवाही, मामले से संबंधित विस्तृत विवरण, मुकदमे का निष्पादन और स्थानांतरण जैसी जानकारी मुहैया कराई जा रही है। इसी तरह ई-न्यायालय सेवा के तहत न्यायिक आदेश और फैसलों की प्रमाणित प्रति, कोर्ट फीस और इससे जुड़ी दूसरी जानकारियां ऑनलाइन प्राप्त की जा सकती है।

            देश के दूरदराज इलाके में रहने वाले व्यक्ति कही से और कि‍सी भी समय वेब साइट क्लिक करके किसी भी मुकदमे की जानकारी प्राप्त करने में सक्षम हैं। इस परियोजना के तहत पहले उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में और इसके बाद जिला एवं अधीनस्थ अदालतों में ई-फाइलिंग सुविधाजनक होती जा रही है। 

            ई-न्यायालय परियोजना के अंतर्गत एक फरवरी 2012 की स्थिति के अनुसार 9,389 अदालतों का कम्प्यूटरीकरण हो चुका है। कुछ अदालतों में मामला दर्ज करने, पंजीकरण, मुकदमों की सूची तैयार करने जैसी सेवाएं भी शुरू हो गई हैं। ई-न्यायालय परियोजना के कार्यान्वयन के लिए एन.आई.सी. को 487.84 करोड़ रूपए उपलब्ध कराए गए हैं।

            न्यायालयों में उच्च गुणवत्ता वाले कम्प्यूटर, प्रिंटर्स, स्कैनर्स, सर्वर, नेटवर्किग उपकरण और नेटवर्क केबलिंग और व्यवधान रहित बिजली आपूर्ति जैसे उपाय करके सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी पर आधारित संरचना को सुदृढ बनाने के सतत् प्रयास चल रहे हैं। इस काम पर  उच्चतम न्यायालय में तीन करोड़ से अधिक रकम खर्च की जा चुकी है जबकि उच्च न्यायालयों में बंबई  उच्च न्यायालय में सबसे अधिक सात करोड़ 53 लाख और सबसे कम एक लाख रूपए पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में खर्च हुए हैं।

            ई-न्यायालय प्रक्रिया का उपयोग करने से पहले इसकी प्रक्रिया को भी समझना जरूरी है। उच्चतम न्यायालय में सिर्फ एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड और व्यक्तिगत रूप से याचिका दायर करने वाले ही ई-फाइलिंग सुविधा का उपयोग कर सकते हैं। इस सुविधा के इस्तेमाल के इच्छुक व्यक्ति या एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड को अपना पता, संपर्क के लिए विवरण तथा ई-मेल का पता देना अनिवार्य है। इस प्रक्रिया को पूरा करने पर ही एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड को लॉग- इन आईडी और व्यक्तिगत रूप से याचिका दायर करने वाले को साइन अप प्रक्रिया से लॉग इन आईडी मिलती है। इस प्रक्रिया के तहत दी जाने वाली कोर्ट फीस का भुगतान सिर्फ क्रेडिट कार्ड से किया जा सकता है। यही प्रक्रिया उच्च न्यायालयों और निचली अदालतें में ई-फाइलिंग के लिए अपनानी होगी।

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* स्‍वतंत्र पत्रकार

मीणा/बि‍ष्‍ट -117

 



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