विज्ञप्तियां उर्दू विज्ञप्तियां फोटो निमंत्रण लेख प्रत्यायन फीडबैक विज्ञप्तियां मंगाएं Search उन्नत खोज
RSS RSS
Quick Search
home Home
Releases Urdu Releases Photos Invitations Features Accreditation Feedback Subscribe Releases Advance Search
हिंदी लेख
माह वर्ष
  • सरदार पटेल- जिन्होंने भारत को एकता के सूत्र में पिरोया (31-अक्टूबर,2017)
  • पटेल: जीवन, सन्देश, एवं उनकी अनंत प्रासंगिकता (30-अक्टूबर,2017)
  • हस्‍तशिल्‍प निर्यात संवर्धन परिषद के बढ़ते कदम (17-अक्टूबर,2017)
  •  भारतीय गौरवशाली गणराज्य के रचयिता – सरदार वल्लभ भाई पटेल (25-अक्टूबर,2017)
  • समर्पित आत्‍मा : सिस्‍टर निवेदिता, आज के भारत के लिए एक प्रेरणा  (25-अक्टूबर,2017)
  • 31 अक्टूबर को सरदार पटेल की जयंती के अवसर पर राष्ट्रीय एकता दिवस 2017 का जश्न (24-अक्टूबर,2017)
  • रो-रो फेरी सेवा और परिवहन एवं लॉजिस्टिक्सय पर उसका प्रभाव (23-अक्टूबर,2017)
  • कारीगरों और बुनकरों की चिंता (14-अक्टूबर,2017)
  • पर्यटन पर्व: भारत की विविधता के अन्वेषण का एक विशेष अवसर (13-अक्टूबर,2017)
  • पर्यटन पर्वः सब देखो अपना देश (13-अक्टूबर,2017)
  • किसानों को खेती में प्रवृत्त रखने की चुनौती (12-अक्टूबर,2017)
  • अहिंसक पथ के प्रेरक : महात्‍मा गांधी (11-अक्टूबर,2017)
  • ग्रामीण भारत में बदलाव (11-अक्टूबर,2017)
  • देश में अपराधी न्याय प्रणाली को फास्ट ट्रैक बनाने के लिये सीसीटीएनएस डिजिटल पुलिस पोर्टल का शुभारंभ (11-अक्टूबर,2017)
  • बेहतर जल प्रबंधन समय की जरूरत (05-अक्टूबर,2017)
  • गांधी जी के लिए अहिंसा स्‍वच्‍छता के समान थी (03-अक्टूबर,2017)
 
विशेष सेवा और सुविधाएँ

कश्मीरी दस्तकारी
विशेष लेख * गुलाम अब्‍बास

विशेष लेख                                                                       * गुलाम अब्‍बास

                                                                            

      जम्मू-कश्मीर सिर्फ विशाल सांस्कृतिक और स्थानिक विवधिता का घर है बल्कि कला एवं शिल् के लिए स्वर्ग भी है जो शताब्दियों से सावधानीपूर्वक तराशी जा रही हैं। वहां की मिट्टी में नमूनों, तकनीकों और शिल् की विविधता है क्योंकि विभिन् क्षेत्रों और अनेक कुशल शिल्पकारों ने प्राकृतिक खूबसूरती के बीच बसने का फैसला किया। समय के साथ यह कला और भी विविधता पूर्ण होती गयी तथा आज कश्मीर ऊनी वस्त्रों, कसीदाकारी सूट, कश्मीरी सिल्क साड़ी, लकड़ी की सजावट, हाथ से बने कार्पेट  और अन्य बहुत सी पारंपरिक कलाओं के लिए जाना जाता है।

कार्पेट

कश्मीरी कार्पेट दुनिया भर में दो बातों के लिए मशहूर हैं-

1. वह हाथ से बनाये जाते हैं।

2. हमेशा उनकी गांठ लगायी जाती है और वह कलगीदार नहीं होते। आमतौर पर इसके लिए रेशम, ऊन या सिल्क और ऊन के धागे इस्तेमाल किये जाते हैं, हालांकि कभी-कभी यदि आधार भी रेशम का हो तो उसकी लागत आनुपातिक रूप से बढ़ती जाती है। कभी-कभी कार्पेट, कपास के आधार पर बनाये जाते हैं, मुख्य रूप से जब रेशम के धागे के साथ ऊनी धागे का गुच्छा लग जाता है तो रेशम के धागे के साथ मुख्य रूप से ऊन के गुच्छे का इस्तेमाल कुछ विशेष नमूनों पर किया जाता है। रंगों के आकर्षक मिश्रण से कश्मीरी कार्पेट अकसर पुरस्कार जीतते रहे हैं।

कश्मीर में कार्पेट की बुनाई मूल रूप से कला नही रही बल्कि माना जाता है कि यह परसिया के रास्ते यहां आई। आज ज्यादातर डिजाइन स्थानीय विविधताओं के साथ परसियन खूबियों से युक्त होते हैं। हालांकि विशिष्ट कश्मीरी डिजाइन का उदाहरण पेड़ो का जीवन हैं कश्मीरी कार्पेट के रंग देश में किसी भी स्थान की तुलना में ज्यादा जटिल होते हैं। कार्पेट की गांठ लगाना बहुत महत्वपूर्ण पहलू है जो इसके टिकाऊ होने का सबूत है तथा ये इसके डिजाइन को और कीमती बनाते हैं। मूल रूप से प्रति वर्ग इंच में गांठों की संख्या जितनी अधिक होती है उसका मूल्य और स्थिरता उतनी है ज्यादा होती है। यही नहीं कार्पेट एकल और डबल गांठ वाले भी होते हैं। एक गांठ वाला कार्पेट ज्यादा रोएंदार और अधिक स्पर्श प्रतिरोधी होता है।

 नमदास  

ऊनी और सूती फाइबर से बने बहुत सस्ते और रंगारंग फर्श के लिए बनाये गये कार्पेट आकृति के लिहाज से हाथों से दबाये जाते हैं। ऊन के प्रतिशत के आधार पर कीमतें भिन्न-भिन्न होती है। नमदास 80 प्रतिशत ऊन से बनता है जो 20 प्रतिशत ऊन वाले कार्पेट से ज्यादा मंहगा होता है।

पेपर मेच

पेपर मेच के कम से कम दस विभिन्न ग्रेड होते हैं। इसलिए कुछ कार्डबोर्ड या लकड़ी के रूप में भी उपलब्ध होते हैं। पेपर मेच को बनाने के लिए कागज को पानी में उस समय तक कुचला जाता है जब तक वह विघटित नहीं हो जाता। उसके बाद इसे गढ्ढे में डाला जाता है और इसमें अढेस्सिव घोल मिलाया जाता है और इसकी आकृति सांचे पर बनायी जाती है तथा सूखने के लिए छोड़ देते हैं। पेंट और वार्निस करने से पहले इसे अच्छी तरह बैठने देते हैं। कागज को कुचल कर जो गूदा बनाया जाता है वह बहुत कोमल होता है और उससे अंतिम उत्पाद तैयार किया जाता है। पेपर मेच की वस्तुओं पर पेंट किये गये डिजाइन चमकीले रंग के होते हैं। वे शिल्प और रंगों का बेहतरीन नमूना होते हैं। ज्यादातर वस्तुओं पर सिर्फ रंग या कुछ नमूनों को रेखांकित करने के लिए सोने का इस्तेमाल किया जाता है तथा उत्पाद को अंतिम रूप देने के अलावा सोने की क्वालिटी उत्पाद की कीमत निर्धारित करने के लिए भी इस्तेमाल की जाती है। बहुत सावधानी से बनायी गयी शुद्ध सोने की पत्ती, कांसे या गोल्ड पोस्टर, पेंट की तुलना में बहुत मंहगी होती हैं तथा यह बहुत लंबे समय तक चलती हैं और कभी बदरंग नहीं होती। उत्पाद को अंतिम रूप देने के लिए वार्निश का इस्तेमाल किया जाता है जिससे उत्पाद को चमकीला बनाने में मदद मिलती है और प्रत्येक परत के बाद चमक बढ़ती जाती है।

शाल

कश्मीरी शाल तीन तरह के रेशे ऊन, पशमीना और शहतूत से बनाये जाते हैं। ऊन के शाल सस्ते होते हैं जबकि शहतूत के शाल बहुत मंहगे होते हैं। कशीदाकारी के काम के कारण ऊनी शाल बहुत मशहूर हैं जो कश्मीर की खूबी है।

       शाल पर अनेक तरह की कशीदाकारी की जाती है। शाल की किनारी पर आमतौर पर पैनल के साथ-साथ सोज़नी या सुई का काम किया जाता है। सुई की कशीदाकारी भी बहुत मशहूर है। शाल की चौड़ाई की किसी भी तरफ चौड़े पैनल में सुई की कढ़ाई की जाती है अथवा शाल की पूरी सतह पर भी कढ़ाई की जाती है। आरी या हुक कशीदाकारी  फूलों का बहुत जाना पहचाना डिजाइन है और यह बहुत महीन काम होता है।

       पशमीना शाल बहुत मुलायम होते हैं और इनका धागा समुद्र की सतह से 14 हजार फीट ऊंचाई पर पाये जाने वाले साकिल के बालों से बनाया जाता है। हालांकि शुद्ध पशमीना बहुत कीमती होता है लेकिन कभी-कभी इसे सस्ता बनाने के लिए खरगोश के बालों को मिलाया जाता है। शहतूत के शाल को बहुत हल्का, मुलायम, गरम माना जाता है तथा यह इतना महीन होता है कि इसे अंगूठी से भी निकाला जा सकता है। इसलिए इससे रिंग शाल के नाम से भी जाना जाता है।

फेरांस

यह वस्त्र कोट की तरह का होता है और इसे फर के नाम से भी जानते है यह बहुत ढीला-ढाला होता है जिसके अंदर जलते हुए कोयलों की अंगीठी रखी जा सकती है। इसे गरम पानी की बोतल की तरह फर के अंदर लेकर चलते हैं। आदमी का फर हमेशा ट्वीड या मोटी ऊन से बनाया जाता है जबकि महिलाओं का फर आमतौर पर राफेल्स से बनाया जाता है और उसके गले,कफ तथा किनारों पर आरी या हुक की कशीदाकारी की जाती है। कशीदाकारी की गुणवत्ता और राफेल की सघनता से उसकी कीमत निर्धारित होती है।

डलिया

शापिंग बास्केट, लैम्प शेड, मेज और कुर्सियां जैसी आकर्षक वस्तुएं बनाने के लिए विल्लो रसेज का इस्तेमाल किया जाता है जो झीलों में बहुतायत से उगते हैं। इससे बनी वस्तुएं आमतौर पर सस्ती होती हैं। लंबे समय तक इस्तेमाल योग्य रखने के लिए समय-समय पर पानी, खासतौर से गरम पानी का छिड़काव किया जाता है ताकि उसे भंगुर होने से बचाया जा सके।

अखरोट की लकड़ी

       कश्मीर भारत का एक मात्र ऐसा भाग है जहां अखरोट के पेड़ उगते हैं। इनका रंग दाने और चमक विशिष्ट होती है तथा इसकी लकड़ी पर बहुत उत्कृष्ट क्वालिटी का कार्य किया जा सकता है। अखरोट के पेड़ दो तरह के होते हैं फल वाली प्रजाति जिसकी लकड़ी बहुत जानी पहचानी है और बिना फल वाली प्रजाति जिसे स्थानीय लोग ज़ांगुल के नाम से जानते हैं। यह लकड़ी कम मजबूत होती है और इस पर दाने नहीं होते जबकि अखरोट की लकड़ी आमतौर पर पूरी काली होती है।

कॉपर और सिल्वरवेयर

पुराने शहर के स्थानीय बाजार की दुकानों में कॉपर की धारियों वाली वस्तुएं नजर आती हैं दीवारों, फर्श और छतों पर भी कॉपर की कारीगरी देखी  जा सकती है। घर में इस्तेमाल होने वाले समोवर, कटोरों, प्लेटों और ट्रे जैसी वस्तुओं पर कॉपर और चांदी की कशीदाकारी देखी जा सकती है। इन वस्तुओं पर कॉपर और कभी-कभी चांदी की फूल पत्तियां बनाई जाती हैं। इनका डिजाइन बहुत आकर्षक होता है इस काशीदाकारी को नकाश के रूप मे जाना जाता है तथा इससे वस्तु की कीमत निर्धारित होती है।

 

******

वि.कासौटिया/प्रदीप/मीना-118

 

 

 

 

 

 



विशेष लेख को कुर्तिदेव फोंट में परिवर्तित करने के लिए यहां क्लिक करें
डिज़ाइन एवं होस्‍ट राष्‍ट्रीय सूचना केंद्र (एनआईसी),सूचना उपलब्‍ध एवं अद्यतन की गई पत्र सूचना कार्यालय
ए खण्‍ड शास्‍त्री भवन, डॉ- राजेंद्र प्रसाद रोड़, नई दिल्‍ली- 110 001 फ़ोन 23389338