विशेष
लेख
· कल्पना
पाल्खीवाला
पिछले
दशक से
दुनिया में
गहरे समुद्र में
उत्खनन की
गतिविधियों
का नया चरण
शुरू हुआ है।
इसके लिए दो
कारक जिम्मेदार
हैं – पहला,
बहमूल्य
धातुओं की
बढ़ती मांग और
दूसरा, भोजन।
दुनिया की
बढ़ती आबादी
को ज्यादा
भोजन की जरूरत
है तथा फास्फोरस
आधारित
उर्वरकों का
दुनिया के
भोजन उत्पादन
में बहुत महत्व
है। समुद्र तल
में फास्फोरस
ग्रंथिकाओं का
खनन कृ्त्रिम
उर्वरक का
श्रेष्ठ
स्रोत है।
गहरे समुद्र
में खनन
अपेक्षाकृत
नए खनिज की पुन:
प्राप्ति की
प्रक्रिया है
जो समुद्र के
तल में होती
है। समुद्रीय
खनन स्थल
आमतौर पर
पॉलीमेटालिक
ग्रंथिकाओं
या सक्रिय और
विलुप्त
हाइड्रोथर्मल
छिद्रों के
विशाल
क्षेत्रों के
आसपास होते
हैं। वे
समुद्र की सतह
से करीब 1,400-3,700
मीटर नीचे
होते हैं।
विलुप्त
हाइड्रोथर्मल
छिद्रों में
सल्फाइड जमा
हो जाती है
जिसमें चांदी,
सोना, तांबा,
मैग्नीज,
कोबाल्ट और
जस्ते जैसी
बहुमूल्य
धातुएं होती
हैं। यह कच्ची
सामग्री
समुद्र की
गहराई में
विभिन्न
रूपों में पाई
जाती है तथा
आमतौर पर पृथ्वी
पर मौजूद
खानों की
तुलना में
अधिक सांद्र होती
है।
समुद्र की
गहराई में जमा
हुई धातुओं को
हाइड्रॉलिक
पम्प या बाल्टी
प्रणाली के
इस्तेमाल
निकाला जाता
है। उसके बाद
इस कच्च्े
माल को
प्रसंस्कृत
करने के लिए
जमीन पर लाया
जाता है।
पॉलीमेटालिक
ग्रंथिकाओं
में निकेल,
तांबा, कोबाल्ट
और मैग्नीज
पाए जाते हैं।
यह सब 4,000 से 6,000
मीटर की गहराई
पर मिलते हैं।
मैग्नीज 800 से
2,400 मीटर नीचे
मिलता है।
मुख्य रूप से
इसमें कोबाल्ट,
कुछ वैनेडियम,
मॉलिब्डनम
और प्लेटिनम
पाया जाता
है। यह
सल्फाइड औसतन
1,400 से 3,700 मीटर
गहराई पर
मिलता है
जिसमें तांबा,
सीसा, जस्ता,
कुछ सोना और
चांदी शामिल
होती है।
अंतर्राष्ट्रीय
समुद्र तल
प्राधिकरण ने
हिंद महासागर में
गहरे समुद्र
में खनिज
संसाधनों के
अन्वेषण के
लिए चीन सहित
अन्य देशों
की तरह भारत
के साथ भी 15
वर्ष का समझौता
किया है। इस
समझौते के
अनुपालन में
पृथ्वी
विज्ञान
मंत्रालय ने
उत्खनन
गतिविधियां
शुरू की हैं
जिनके लिए मध्य
हिंद महासागर
में कुल 75,000 वर्ग
किलोमीटर
क्षेत्र
उपलब्ध
कराया गया है।
इसके साथ भारत
दुनिया के कुछ
गिने-चुने
देशों में
शामिल हो
जाएगा जो आगामी
कुछ वर्षों
में गहरे
समुद्र में
खनिजों का उत्खनन
करने में
सक्षम हो
जाएंगे।
***
वि.कासोटिया/प्रदीप
– 160
· लेखिका
स्वतंत्र
लेखन करती हैं