नदी पर
बनने वाले इस
पुल के मेहराब
के हिस्से के
निर्माण के
लिए एक नई
निर्माण
प्रक्रिया का
इस्तेमाल
किया जा रहा
है जिसमें
केबल कार की
मदद ली जा रही
है। यह केबल
कार 54 एम.एम. की
तार पर चलती
है जो नदी
घाटी के आर-पार
लगाई गई है
तथा नदी के एक किनारे
को दूसरे
किनारे के साथ
127 मीटर ऊंची मीनार
के माध्यम से
जोड़ा गया है।
इस परियोजना
के लिए इस्पात
का काफी इस्तेमाल
किया जा रहा
है। चिनाब पुल
के निर्माण में
आधार के निर्माण
के लिए 46 हजार
सीयूएम
कंक्रीट, 3600 टन
रिइनफोर्समेंट
स्टील और 25
हजार टन स्ट्रक्चरल
स्टील का इस्तेमाल
किया जा रहा
है जो किसी
फुटबाल के
मैदान के आकार
की जमीन पर 54
मंजिले भवन के
आकार के समतुल्य
है। इस्पात
संरचना को आपस
में जोड़ने के
लिए अत्याधुनिक
वैल्डिंग
प्रौद्योगिकी
का इस्तेमाल
किया जा रहा
है।
चिनाब
नदी के ऊपर
रेलवे पुल बन
जाने से बक्कल
(कटरा) और कौरी
(श्रीनगर) के
किनारे आपस
में जुड़ गए
हैं। नदी के
बहाव में बिना
किसी अवरोध के
पुल निर्माण
करना एक
चुनौती भरा
काम था। प्रमुख
आधारशिला तक
पहुंचने के
लिए लगभग पांच
किलोमीटर
लंबी जो सड़क
बनाई जा रही
है, वह बड़े
दुर्गम इलाके
में स्थित है।
आधारशिला की
स्थिरता के
लिए ढलानों को
इस तरह बनाया
गया है ताकि
कोई दिक्कत न
हो। ये ढलानें
चट्टानों को
आपस में जोड़कर
सुरक्षित की
गई हैं। कटरा
की तरफ से
रेलवे लाइन 5.9
किलोमीटर
लंबी सुरंग से
गुजरती है और
अन्य पुलों
से होते हुए,
सलाई-ए नामक
स्टेशन पर
पहुंचती है।
चिनाब पुल से
गुजरने के बाद,
रेललाइन
सलाई-बी हाल्ट
स्टेशन पर तक
आती है। ये
दोनों स्टेशन
नदी के दोनों
किनारों पर
रहने वाली स्थानीय
आबादी की
सुविधा के लिए
बनाए जा रहे
हैं।
पुल
को इस तरह
डिजाइन किया
गया है कि वह 266
किलोमीटर
प्रतिघंटा की
रफ्तार से
चलने वाले हवा
के झोंकों को
झेल सके। इसका
परीक्षण डेन्मार्क
में किया जा
चुका है।
बहरहाल,
रेलगाड़ी को
उस समय पुल पर
जाने से रोक
दिया जाएगा,
जब हवा की गति 90
किलोमीटर
प्रतिघंटे से
अधिक होगी। हवा
की गति नापने
के लिए वायु मापक
यंत्र लगाए
जाएंगे। इसके
अलावा भूकंप,
तापमान की
निगरानी आदि
की अवस्था
में भूगर्भीय
गति को मापने
के लिए
गतिमापक यंत्र
भी लगाए
जाएंगे। ये
दोनों यंत्र
निकटवर्ती स्टेशन
को खतरे की
सूचना देने के
लिए
संवेदनशील स्थानों
पर लगाए
जाएंगे। पुल
के लिए विभिन्न
भू-तकनीकी
जांचें की जा
रही हैं,
जिसमें
मिट्टी की
जांच, पुल की
मेहराब आदि
शामिल हैं।
कटरा
से धरम तक के
क्षेत्र का
निर्माण
कोंकण रेलवे
कर रही है। यह
पूरा क्षेत्र
70 किलोमीटर लंबा
है। इसमें 59.457
किलोमीटर (85
प्रतिशत) रास्ता
सुरंगों से, 6.6
किलोमीटर (9
प्रतिशत) रास्ता
पुलों से और
बाकी (6
प्रतिशत) रास्ता
मोड़ों से
होकर गुजरता
है। इस स्थल
तक पहुंचने के
लिए कोंकण
रेलवे को 166
किलोमीटर
लंबी
परियोजना-सड़क
बनानी होगी,
इसमें सुरंगों
और अस्थायी
पुलों का
निर्माण भी
करना होगा।
संरेखन
की समीक्षा के
लिए जुलाई 2008 में
काम रूक गया
था। समीक्षा
के बाद सितंबर
2009 में काम फिर
से शुरू हुआ।
बदले नियम को
ध्यान में
रखते हुए अभी 28
किलोमीटर की
दूरी का स्थानिक
सर्वेक्षण का
काम चल रहा
है। परियोजना को दिसंबर
2017 तक पूरा करने
का लक्ष्य
है। परियोजना
को तेजी से
पूरा करने के
लिए कोंकण
रेलवे ने जम्मू
में परियोजना
मुख्यालय स्थापित
किया है। इस
परियोजना के
शिविर रियासी,
कौरी,
दुग्गा और
संगलधन में
स्थित हैं।
परियोजना को
पूरा करने के
लिए कोंकण
रेलवे
(केआरसीएल) ने 240
कर्मचारियों
और
इंजीनियरों
के एक दल को
लगा रखा है।
निर्माण के
लिए उपयुक्त
मशीनें,
सामग्री, आवश्यक
तकनीक और कुशल
एवं अकुशल
श्रमशक्ति की
व्यवस्था
कोंकण रेलवे
के ठेकेदार कर
रहे हैं।
डिजाइन
में मदद के
लिए कई राष्ट्रीय
और
अंतर्राष्ट्रीय
एजेंसियों को
लगाया गया है।
रेलवे के
निर्माण
कार्य को पूरा
करने के लिए
पथरीली जमीन
पर 166 किलोमीटर
लंबी संपर्क
सड़क का
निर्माण भी काफी
चुनौतीपूर्ण
काम है।
कोंकण
रेलवे को रोहा
से ठोकुर
(मंगलौर के
पास) तक 740
किलोमीटर के
रेलमार्ग के
निर्माण का
अनुभव है। इस
रेलमार्ग पर 85
किलोमीटर के
बीच 91 सुरंग
हैं। इसमें
देश की सबसे
लंबी 6.5
किलोमीटर लंबा
कारबुडे
परिवहन सुरंग
भी शामिल है ।
पूरे कोंकण रेलवे
मार्ग पर 179
बड़े पुल बनाए
गये हैं जिनकी
कुल लंबाई 19.8
किलोमीटर है।
इस मार्ग पर
सबसे बड़ा पुल
2 किलो मीटर
लंबा शारवती
नदी पर है।
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वि.कासौटिया/सुधीर/अरूण/अनिल/भगवती/सुनीता/पवन
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