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विशेष सेवा और सुविधाएँ

वर्ष 2011-12 में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की मुख्य उपलब्धियां
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विशेष लेख

 

     वर्ष 2011-12 के दौरान पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की मुख्य उपलब्धियां इस प्रकार हैं:-

वायुमण्डलीय एवं समुद्री सेवाएं

मौसम पूर्वानुमान: सात दिन पहले तक वैश्विक स्तरीय पूर्वानुमान लगाने के लिए वैश्विक डाटा आत्मसात करने के वास्ते ग्रिड पाइंट सांख्यिकीय अंतर्वेशन (जीएसआई) स्कीम समाविष्ट करते हुए हवा, तापमान, आर्द्रता और वर्षा जैसे महत्वपूर्ण पैरामीटरों के लिए 35 किलोमीटर के  आकाशीय विभेदन के साथ वैश्विक पूर्वानुमान प्रणाली (जीएफएस टी 382/एल 64) चालू की गई।

            उन्नत प्रशिक्षण विद्यालय: पृथ्वी विज्ञान के क्षेत्र में मानव संसाधन विकास की दिशा में, पुणे में प्रशिक्षण और शोध के लिए सुविधाओं के साथ उन्नत प्रशिक्षण विद्यालय की स्थापना की गई। इस केंद्र  का मुख्य उद्देश्य भूमि, समुद्र, वायुमंडल, जीवमंडल की अलग-अलग भौतिक प्रक्रियाओं और जलवायु परिवर्तन पर विशेष बल के साथ क्रायोस्फेयर की गहरी समझ और व्यावहारिक विशेषज्ञता के साथ प्रशिक्षित एवं समर्पित पृथ्वी एवं पृथ्वी प्रणाली वैज्ञानिकों का विशाल पूल बनाना है। इसका उद्देश्य अलग-अलग प्रणालियों पर पारंपरिक प्रशिक्षण से आगे बढ़ना तथा उक्त अवयव प्रणालियों के बीच अंतः क्रिया से उत्पन्न प्रक्रियाओं के रूप में मौसम एवं जलवायु से निपटना है। राष्ट्रीय चयन प्रक्रिया के जरिए अगस्त 2011 में 20 विद्यार्थियों के पहले बैच को प्रवेश दिया गया।

भारतीय समुद्री पूर्वानुमान प्रणाली (इंडोफोस): 21 मार्च, 2011 को 1/8 डिग्री (अर्थात 13 किमी) पर क्षेत्रीय सागर मॉडलिंग प्रणाली स्थापित करने के साथ भारतीस सागर पूर्वानुमान प्रणाली (इंडोफोस) का उन्नत किया गया। इस उन्नयन से पूर्वानुमान, विशेष रूप से अनुलम्ब प्रोफाइल्स और सतही और उपसतही धाराओं में पूर्वानुमान की क्वालिटी में महत्वपूर्ण सुधार हुआ है। फिलहाल यह प्रणाली 5-7 दिन पहले तक लहरों की ऊंचाई, लहरों की दिशा, समुद्री सतह तापमान (एसएसटी), सतही धाराओं, मिश्रित परत गहराई (एमएलडी) और 20 डिग्री सेंटीग्रेड समताप रेखा की गहराई पर पूर्वानुमान उपलब्ध कराती है।

आपदा प्रशामन सहायता

त्सुनामी के लिए शीघ्र चेतावनी प्रणाली: यूनेस्को कार्यक्रम के अंतर-सरकारी समुद्रवैज्ञानिक आयोग के समग्र ढांचे के तहत हिंद महासागर के 29 देशों के समन्वय से त्सुनामी चेतावनी प्रणाली के अंग के रूप में 12 अक्तूबर, 2011 को सारे भारत में मॉक ड्रिल अभ्यास सुलतापूर्वक आयोजित किया गया। इस अभ्यास के साथ यूनेस्को ने क्षेत्रीय त्सुनामी सेवा प्रदाता के रूप में भारतीय त्सुनामी चेतावनी प्रणाली के संचालन की जिम्मेदारी भारतीय त्सुनामी चेतावनी प्रणाली को सौंपी है। इस केंद्र को हिंद महासागर क्षेत्र के लिए क्षेत्रीय त्सुनामी सेवा प्रदाता के रूप में मान्यता दी गई है तथा हिंद महासागर रिम देशों के लिए इसने कार्य शुरू कर दिया है।

सागर प्रौद्योगिकी और संसाधन

रिमोटली आप्रेबल सबसी इन-सितु सॉइल टैस्टर (आरओएसआईएस) विकसित किया गया तथा अक्तूबर 2011 में केंद्रीय हिंद महासागर बेसिन में (सीआईओबी) में 5,462 मीटर की गहराई पर पानी में इसका परीक्षण किया गया। यह परीक्षण गहरे सागर से बहुधातुई ग्रंथिकाओं के खनन के प्रदर्शन की दिशा में भारत के अनुसंधान एवं विकास के प्रयासों में महत्वूपर्ण मील का पत्थर है।

मौसम विज्ञान विषयक सेवाएं

जिला-स्तरीय कृषि-मौसम संबंधी परामर्श सेवा: देश के 550 जिलों में पांच दिन पहले जिला स्तरीय मौसम पूर्वानुमान प्रणाली के साथ जिला स्तरीय कृषि-मौसम संबंधी परामर्श सेवा दिसंबर 2010 से किसानों के लिए शुरू हो गई है। यह सेवा केंद्र सरकार के अनेक मंत्रालयों और संगठनों, राज्य स्तरीय संस्थानों, निजी एजेंसियों, स्वयं सेवी संगठनों, प्रगितिशील किसानों और मीडिया की भागीदारी से शुरू की गई है। कृषि गतिविधियों की योजना बनाने के उद्देश्य से मोबाइल के जरिए जानकारी हासिल करने के लिए करीब 25,00,000 किसानों ने यह सेवा ली है।

आधुनिक मौसम वैज्ञानिक सेवाएं:  डाटा संग्रहण और पूर्वानुमान प्रसार अपेक्षाओं के समर्थन में हाई बैंडविथ के साथ अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी (एडब्ल्यूएस, एआरती, डीडब्ल्यूआर, जीपीएस सोंड) के जरिए वायुमंडलीय प्रेक्षण प्रणालियों को मजबूत बनाया गया। मौसम विभाग की संशोधित क्षेत्रवार चेतावनी सेवाएं प्रदान करने के लिए एकीकृत रीयल टाइम डाटा विश्लेषण, जांच करना, व्याख्या, कल्पना, मल्टी-प्रॉडक्ट अधिचित्रण, पूर्वानुमान इत्यादि के लिए प्रणालियों (हार्डवेयर और साफ्टवेयर दोनों) को चालू किया गया है। इस कार्यक्रम के अंग के रूप में, मौसम संबंधी पैरामीटर्स की वास्तविक निगरानी के लिए देश के विभिन्न भागों में 950 से अधिक प्रणालियों की स्थापना के जरिए वायुमंडल प्रेक्षण प्रणाली को मजबूत बनाया गया है। मंत्रालय के विभिन्न केंद्रों में 4 उच्च निष्पादन गणना प्रणालियों के सेट को चालू करने के जरिए गणना सुविधाओं में महत्वपूर्ण वृद्धि की गई है जिसके बाद कुल मिलाकर इनकी क्षमता 124 टीफ्लॉप्स हो गई है। इस कार्यक्रम के अंग के रूप में, वायुमंडलीय प्रेक्षण नेटवर्क में महत्वपूर्ण वृद्धि की गई है जिसमें इस अवधि के दौरान दिल्ली, नागपुर, हैदराबाद, लखनऊ, पटियाला, अगरतला और मुंबई जैसे विभिन्न शहरों में 7 से अधिक डॉप्लर मौसम राडारों की स्थापना शामिल है। यह भारतीय मौसम विभाग के आधुनिकीकरण के अंग के रूप में किया गया है।  डॉप्लर मौसम राडारों की स्थापना से इन शहरों में मौसम के पूर्वानुमान में सुधार हो गया है। इनके अलावा देश के विभिन्न स्थानों में 533 से अधिक एडब्ल्यूएस और 350 एआरजीएस की स्थापना की गई है।

मानसून पूर्वानुमान 2011: दक्षिण पश्चिम मॉनसून पूर्वानुमान 2011 अप्रैल 2011 में जारी किए गए 98 प्रतिशत के अनुमान की तुलना में 101 प्रतिशत सही साबित हुआ था।

उन्नत प्रशिक्षण विद्यालय: पृथ्वी विज्ञान के क्षेत्र में मानव संसाधन विकास की दिशा में, पुणे में प्रशिक्षण एवं शोध के लिए स्वनिहित सुविधाओं के साथ उन्नत प्रशिक्षण विद्यालय स्थापित किया गया था। इस केंद्र का मुख्य उद्देश्य भूमि, समुद्र, वायुमंडल, जीवमंडल की अलग-अलग भौतिक प्रक्रियाओं और जलवायु परिवर्तन पर विशेष बल के साथ क्रायोस्फेयर की गहरी समझ और व्यावहारिक विशेषज्ञता के साथ प्रशिक्षित एवं समर्पित पृथ्वी एवं पृथ्वी प्रणाली वैज्ञानिकों का विशाल पूल बनाना है। इसका उद्देश्य अलग-अलग प्रणालियों पर पारंपरिक प्रशिक्षण से आगे बढ़ना तथा उक्त अवयव प्रणालियों के बीच अंतः क्रिया से उत्पन्न प्रक्रियाओं के रूप में मौसम एवं जलवायु से निपटना है। राष्ट्रीय चयन प्रक्रिया के जरिए अगस्त 2011 में 20 विद्यार्थियों के पहले बैच को प्रवेश दिया गया।

मेट्रो-शहर मौसम पूर्वानुमान: राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों के लिए स्थान विशेष के मौसम और हवा की क्वालिटी का पूर्वानुमान 24 घंटे पहले सफलतापूर्वक उपलब्ध कराया गया। वर्तमान एवं भविष्य के मौसम की जानकारी सहित जानकारी के साथ-साथ ओजोन (o3), नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx), कार्बन मोनाऑक्साइड ( CO ), बेंजीन और अन्य हाइड्रोकार्बन, 2 भिन्न आकार के विविक्त पदार्थों अर्थात PM10,  PM 2.5 और ब्लैक कार्बन नामक प्रमुख गैसीय प्रदूषकों के बारे में जानकारी 11 एयरक्वालिटी स्टेशनों और 34 मौसम स्टेशनों पर आधारित है। डॉप्लर मौसम राडार के इस्तेमाल से राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान सभी स्टेडियमों के लिए स्थान विशेष के वर्तमान और भविष्य के लिए पूर्वानुमान भी जारी किए गए। यह जानकारी एलसीडी और एलईडी प्रदर्शनों तथा डायनेमिक वेब पेज के जरिए प्रसारित की गई। फिलहाल, स्थान विशेष के लिए स्थापित प्रेक्षण प्रणालियां समूचे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में समुचित स्थानों पर पुनः स्थापित की जा रही हैं।

समुद्र विज्ञान और सूचना विज्ञान

मछली पकड़ने के चिह्नित संभावित क्षेत्रों के लिए मत्स्य सलाह: रिमोट सेंसिंग टैक्नोलोजी के इस्तेमाल से मछली पकड़ने के संभावित क्षेत्रों की पहचान करने पर आधारित मछुआरों को सलाह देने की विशिष्ट प्रणाली चालू की गई है। परिचालन के आधार पर ट्यूना मछली संबंधी नई परामर्श सेवा शुरू की गई है। जानकारी के प्रसार के लिए अब तक 93 से अधिक इलेक्ट्रॉनिक डिस्प्ले बोर्ड लगाए जा चुके हैं।

            विभिन्न परिचालन समुद्री जानकारी सेवाओं के लिए इनकोईस में उपग्रह डाटा को उचित समय में सीधे ग्रहण करने के लिएइनकोईस, हैदराबाद में समर्पित समुद्री सैट उपग्रह ग्राउंड सिस्टम संस्थापित किया गया है।

            गहरे समुद्र में मछली पकड़ने के उद्योग संबंधी जानकारी सृजित करने और प्रसारित करने के लिए ट्यूना मछली पकड़ने संबंधी परामर्श सेवाएं चालू की गई हैं।

            भारत के 5 प्रमुख कोरल पर्यावरणीय स्थलों अर्थात अंडमान निकोबार, लक्षद्वीप, मन्नार की खाड़ी और कच्छ की खाड़ी के बारे में दो महीने में एक बार स्थिति की जानकारी के लिए कोरल ब्लीचिंग अलर्ट सिस्टम स्थापित किया गया है। यह कोरल पर्यावरण के बारे में शीघ्र जानकारी उपलब्ध कराता है जो थर्मल तनाव और संभावित ब्लीचिंग अनुभव करते हैं।

भारतीय समुद्री पूर्वानुमान प्रणाली (इंडोफोस): 21 मार्च, 2011 को 1/8 डिग्री (अर्थात 13 किमी) पर क्षेत्रीय सागर मॉडलिंग प्रणाली स्थापित करने के साथ भारतीस सागर पूर्वानुमान प्रणाली (इंडोफोस) का उन्नत किया गया। इस उन्नयन से पूर्वानुमान, विशेष रूप से अनुलम्ब प्रोफाइल्स और सतही और उपसतही धाराओं में पूर्वानुमान की क्वालिटी में महत्वपूर्ण सुधार हुआ है। फिलहाल यह प्रणाली 5-7 दिन पहले तक लहरों की ऊंचाई, लहरों की दिशा, समुद्री सतह तापमान (एसएसटी), सतही धाराओं, मिश्रित परत गहराई (एमएलडी) और 20 डिग्री सेंटीग्रेड समताप रेखा की गहराई पर पूर्वानुमान उपलब्ध कराती है। यह प्रणाली जनवरी 2010 से चालू है। समुद्री प्रेक्षण नेटवर्क के अंग के रूप में, भारत के आसपास के महासागरों से वास्तविक डाटा के अर्जन के लिए 16 मूर्ड बुओय नेटवर्क का सेट स्थापित किया गया है और पहली बार लगातार चलते हुए इसे छह महीने हो गए हैं। उपग्रह डाटा के वैधीकरण के अलावा चक्रवात की चेतावनी उपलब्ध कराने सहित मौसम का पूर्वानुमान लगाने के लिए यह डाटा उपयोगी पाया गया है।

आपदा प्रशामन सहायता

त्सुनामी के लिए शीघ्र चेतावनी प्रणाली: सितंबर 2007 में त्सुनामी की चेतावनी देने वाली अत्याधुनिक प्रणाली स्थापित की गई थी जिसे हिंद महासागर के देशों के लिए क्षेत्रीय त्सुनामी चेतावनी केंद्र के रूप में मान्यता दी गई है। हाई-रेजोल्यूशन मॉडलों के कार्यान्वयन के कारण चक्रवात चेतावनी संबंधी प्रदर्शन में सुधार हुआ है और वायुमंडलीय एवं समुद्री डाटा अर्जित करने की क्षमता बढ़ी है। आपदा चेतावनी सेवाओं के अंग के रूप में अंडमान एवं निकोबार तथा लक्षद्वीप के लिए तटीय संवेदनशीलता मापन सूचकांक पूरा हो गया है। 2010 के दौरान जलवायु विज्ञान और निरंतर पूर्वानुमान संबंधी 12वें और 24वें चक्रवात पूर्वानुमान के लिए प्रतिशत सुधार क्रमशः 18.1 प्रतिशत और 24.1 प्रतिशत पाया गया। इस केंद्र को हिंद महासागर क्षेत्र के लिए क्षेत्रीय त्सुनामी सेवा प्रदाता के रूप में  मान्यता दी गई है तथा हिंद महासागर रिम देशों के लिए इसने काम शुरू कर दिया है। यूनेस्को कार्यक्रम के अंतर-सरकारी समुद्रवैज्ञानिक आयोग के समग्र ढांचे के तहत हिंद महासागर के 29 देशों के समन्वय से त्सुनामी चेतावनी प्रणाली के अंग के रूप में 12 अक्तूबर, 2011 को सारे भारत में मॉक ड्रिल अभ्यास सुलतापूर्वक आयोजित किया गया। इस अभ्यास के साथ यूनेस्को ने क्षेत्रीय त्सुनामी सेवा प्रदाता के रूप में भारतीय त्सुनामी चेतावनी प्रणाली के संचालन की जिम्मेदारी भारतीय त्सुनामी चेतावनी प्रणाली को सौंपी है।

ध्रुवीय विज्ञान और क्रायोस्फेयर

  • दक्षिण ध्रुव अभियान: दक्षिण ध्रुव पर पहला वैज्ञानिक अभियान नवंबर 2010 में सफलतापूर्वक पूरा हो गया। वैज्ञानिकों के दल ने विषम जलवायु दशाओं में ध्रुव और और आसपास के क्षेत्र से वायुमंडलीय वायुविलय डाटा और खोदे गए बर्फ के छोटे टुकड़े एकत्र किए। दक्षिण ध्रुव अभियान दल 21 नवंबर को 90 डिग्री दक्षिण और 0 डिग्री पश्चिम की अवस्था में पहुंचा। इस दल ने दक्षिण ध्रुव के आर-पार जाने के दौरान लगभग 2,240 किमी यात्रा की। दक्षिण ध्रुव के मार्ग के साथ-साथ ध्रुव पर अनेक वैज्ञानिक अभियान चलाए गए हैं जिनमें शामिल हैं: (i) बर्फ की रासायनिक संरचना की विभिन्नता, विविक्त पदार्थ इत्यादि के अध्ययन के लिए मैत्री-दक्षिण ध्रुव (आमुंडसेन-स्कॉट स्टेशन) अनुप्रस्थ के साथ-साथ नियमित अंतराल पर टुकड़े उठाना (ii) बेड रॉक टोपोग्राफी और उप-सतही-बर्फ संरचना समझने के लिए अनुप्रस्थ के साथ जीपीआर खंड (iii) पठार के साथ-साथ ग्लेसियल-जियोमार्फोलोजिकल लैंडफार्म्स का अध्ययन।
  • अंटार्कटिक में तीसरा स्टेशन: दक्षिण ध्रुव अभियान के लिए पहला वैज्ञानिक अभियान पहली बार शुरू किया जाएगा। मार्च 2009 में चलाए गए 29वें अंटार्कटिक अभियान के दौरान 4 टन के भारी उपकरण (अमरीकी क्रेन - एमएएनटीआईएस) के परिवहन सहित अंटार्कटिक में तीसरे स्टेशन की स्थापना के लिए लार्समैन पर्वतीय क्षेत्र में अध्ययन पूरा किया गया।

 

समुद्री प्रौद्योगिकी और संसाधन

निम्न तापमान थर्मल विलवणीकरण (एलटीटीडी): लक्षद्वीप में दो और एलटीटीडी संयंत्र चालू किए गए जिनमें से एक मार्च 2011 के दौरान मिनिकॉय में और दूसरा अगस्त 2011 के दौरान अगत्ती में लगाया गया। इन संयंत्रों ने इन द्वीपों की स्थानीय आबादी की पेयजल की ज़रूरतों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। बिजली संयंत्रों से फालतू ऊष्मा के इस्तेमाल से एनआईओटी ने 22.2.2009 को उत्तरी चेन्नई बिजली संयंत्र को चालू करने और पहले परीक्षण के दौरान ताजा पानी के उत्पन्न करने के जरिए एलटीटीडी प्रौद्योगिकी प्रदर्शित की। इन संयंत्रों की क्षमता 1 लाख लीटर प्रति दिन है। लक्षद्वीप के अन्य द्वीपों में छह और संयंत्र सार्वजनिक-निजी भागीदारी के जरिए स्थापित किए जाएंगे जिनमें से आमिनी, चेटलेट, कदामठ, काल्पेणी, किल्तान और एंड्रोट में एक-एक संयंत्र स्थापित किया जाएगा। निविदाओं को अंतिम रूप दे दिया गया है।

खनन प्रौद्योगिकी: हिंद महासागर में 5,289 मीटर पर रिमोट चालित सबमर्सिबल का परीक्षण किया गया था जो संसाधनों के उत्खनन के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है। केंद्रीय हिंद महासागर में मृदा टैस्टर का परीक्षण किया गया।

            समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र संधि के प्रावधान के तहत महाद्वीपीय जल सीमा की बाहरी सीमाओं का विलवणीकरण - 1982 12 मई, 2009 की निर्धारित समय सीमस द्वारा महाद्वीपीय जल सीमा पर भारत के दावे के लिए मंत्रिमंडल के निर्णय के अनुसार 11 मई, 2009 को अपनी महाद्वीपीय जल सीमा की बाहरी सीमा की स्थापना की दिशा में 1982 यूएनसीएलओएस के अनुच्छेद 76 के अनुपालन में आंशिक स्वीकारोक्ति है।

तटीय समुद्री पारिस्थितिकी

सजावटी मछलियों के प्रजनन और पालन-पोषण के लिए पूर्ण रूप से सुसज्जित अंडज उत्पत्ति शाला लक्षद्वीप के अगत्ती में स्थापित की गई। विदूशक मछलियों की 2 प्रजातियों के व्यवसायिक उत्पादन के लिए प्रौद्योगिकी, पिंकटाडा मार्गरिटिफेरा (काले ओठ वाला पर्ल आएस्टर) के स्पैट विकास के लिए हैचरी प्रौद्योगिकी अंडमान द्वीप समूह में हैचरी यूनिट में सम्पूर्ण की गई है। समुद्री सजावटी मछलियों के कैप्टिव प्रजनन के लिए हैचरी प्रौद्योगिकी विकसित करने तथा इस प्रौद्योगिकी को द्वीपवासियों को हस्तांतरित करने के लिए मार्च 2009 के दौरान लक्षद्वीप के अगत्ती द्वीप में फील्ड शोध स्टेशन स्थापित किया गया। वर्ष 2010 में, समुद्री जीव संसाधन एवं पारिस्थितिकी केंद्र ने उपग्रह और यथावत डाटा दोनों के इस्तेमाल से भारतीय ईईजेड में 4.32 एमएसवाई (अधिकतम टिकाऊ उपज) के भारतीय ईईजेड में पहली बार मछलियों की क्षमता के लिए अनुमान लगाया।

जलवायु परिवर्तन विज्ञान

मंत्रालय ने स्वास्थ्य, कृषि और पानी जैसे क्षेत्रों पर प्रभावों सहित जलवायु परिवर्तन संबंधी विभिन्न वैज्ञानिक मुद्दों से निपटने के लिए पुणे में जलवायु परिवर्तन शोध के लिए समर्पित केंद्र की स्थापना की है। जलवायु परिवर्तन शोध के लिए उन्नत एचपीसी सिस्टम के चालू होने पर समुद्री-वायुमंडलीय मॉडलों के इस्तेमाल से मॉनसून के दीर्घावधि (बहु-दशकीय) सहकालिक अनुमान लगाए जा रहे हैं।

केंद्रों का नेटवर्क

मंत्रालय द्वारा प्रदत्त की जा रही विविध सूचना सेवाओं के लिए उपयोगी प्रभावी संचार और डाटा अंतरण के लिए पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सभी केंद्रों को जोड़ने के लिए राष्ट्रीय ज्ञान नेटवर्क (एनकेएन) की स्थापना की गई है। मंत्रालय और संबंधित शहरों में स्थापित अन्य संगठनों के विभिन्न वैज्ञानिकों के बीच संचार सुधारने के लिए पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के सभी केंद्रों में टेलीप्रजेन्स का परिचालन किया गया है। इसे विभिन्न बैठकें आयोजित करने के लिए इस्तेमाल किया गया है जिससे विभिन्न बैठकें आयोजित करने में लागत और समय में महत्वपूर्ण कमी हुई है।

मीणा/प्रदीप 206

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 



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