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विशेष सेवा और सुविधाएँ

पंडित मदन मोहन मालवीय - व्यक्ति, अंतरात्मा, मिशन

विशेष लेख

पंडित मदन मोहन मालवीय

 

वाई एस कटारिया *

राष्ट्रपति ने पंडित मदन मोहन मालवीय  (मरणोपरांत) और श्री अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न से सम्मानित करने की घोषणा की है।

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने पंडित मदन मोहन मालवीय और श्री अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न देने की घोषणा पर प्रसन्नता व्यक्त की है।

प्रधानमंत्री ने कहा, ” पंडित मदन मोहन मालवीय और श्री अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न दिया जाना बहुत खुशी की बात है। इन महान हस्तियों को देश का सर्वोच्च सम्मान राष्ट्र के प्रति उनकी सेवा का उपयुक्त सम्मान है। पंडित मदन मोहन मालवीय असाधारण विद्वान और स्वतंत्रता सेनानी के रूप में याद किए जाते हैं जिन्होंने लोगों में राष्ट्रीय चेतना की लौ जलाई। अटल जी हर किसी के लिए बहुत अधिक सार्थक हैं। मार्गदर्शक, प्रेरणा और महान से भी महान। भारत  के लिए उनका योगदान अमूल्य है।

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प्रयाग में शिक्षित सनातन हिंदू परिवार में 25 दिसंबर, 1861 को जन्मे मदन मोहन मालवीय को भारत के असाधारण एवं श्रेष्ठ सपूत के रूप में मान्यता हासिल है।

उनके बहुमुखी व्यक्तित्व ने उन्हें महान देशभक्त के साथ दूरदृष्टा शिक्षाविद, समाज सुधारक, उत्साही पत्रकार, अनिच्छुक मगर प्रभावशाली वकील, सफल सांसद और असाधारण नेता बनाया। मालवीय जी की अनेक उपलब्धियों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी या काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना थी। उनके जीवन काल में ही बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी भारत एवं विश्व में ज्ञान की राजधानी के रूप में जानी जाने लगी थी।

पंडित मदन मोहन मालवीय ने इस संस्थान के साथ भारतीय शिक्षा के क्षेत्र में इतिहास रचा यह देश में अपनी तरह की पहली संस्था थी। उन्होंने इसके लिए बनारस को चुना, क्योंकि यहां सदियों से शिक्षा, बुद्धि और आध्यात्मिकता की परंपरा रही है। उनका विजन प्राचीन शिक्षा के केंद्रों तक्षशिला और नालंदा तथा अन्य प्रमुख संस्थानों से बेहतरीन भारतीय शिक्षा का पश्चिम की आधुनिक यूनिवर्सिटीज की श्रेष्ठ परंपरा का संगम प्रस्तुत करना था।

एनी बेसेंट, महात्मा गांधी, रबींद्रनाथ ठाकुर, श्याम चरण डे जैसे अनेक महान मस्तिष्क और व्यक्तित्व वाले महापुरुषों ने ज्ञान की खोज, भारत में राष्ट्रीयता की भावना जगाने और शिक्षा एवं सदाचार की शक्ति के साथ आजादी हासिल करने के उनके प्रयास में साथ दिया।

मालवीय जी का निधन 1946 में हुआ। लेकिन उनकी भावना आज भी जीवित है और अनेक लोगों ने उनके द्वारा प्रज्ज्वलित, जोतको जलाए खा है तथा अनेक उनकी जिम्मेदारी में भागीदार बनने के लिए तैयार हैं।

मालवीय भवन

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मालवीय भवन विश्वविद्यालय के संस्थापक का पूर्व निवास है जो मालवीय शताब्दी वर्ष के दौरान 1961 में जनता के लिए खोला गया। इस स्मारक की इमारत महामना जी के जीवन एवं शिक्षा के बारे में अध्ययनों एवं शोध के केंद्र के रूप में काम करती है। इसमें पांच मुख्य भाग हैं - गीता-योग पुस्तकालय, योग साधना केंद्र, गीता समिति, मालवीय अध्ययन संस्थान तथा जीवन मूल्यों के अध्ययन के लिए मालवीय केंद्र। योग के लिए केंद्र योग में डिप्लोमा और सर्टिफिकेट कोर्स कराता है। गीता समिति धार्मिक-आध्यात्मिक विषयों पर प्रातःकालीन व्याख्यान आयोजित करती है। प्रत्येक रविवार प्रतिष्ठित विद्वान गीता की व्याख्या करते हैं। जीवन मूल्यों के अध्ययन के लिए केंद्र समेकित व्यक्तित्व विकास के लिए जीवन मूल्यों की शिक्षा पर लघु अवधि कोर्स कराता है। मालवीय भवन में खूबसूरत गार्डन है जिसमें विविध प्रकार के पौधे हैं। प्रत्येक वर्ष यहां विश्वविद्यालय की पुष्प प्रदर्शनी आयोजित की जाती है। मालवीय भवन का केंद्रीय सभागार अकसर महत्वपूर्ण सांस्कृतिक एवं धार्मिक कार्यक्रमों और व्याख्यानों के लिए उपयोग किया जाता है।

 

महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी का जीवन परिचय (1861-1946)

भारतीय संस्कृति एवं बुद्धि का मूर्त रूप महामना पंडित मदन मोहन मालवीय का जन्म 25 दिसंबर 1861 अर्थात हिंदू पंचांग के अनुसार पौष कृष्णाष्टमी, बुधवार संवत 1918 विक्रमी को प्रयाग (भारती भवन, इलाहाबाद) में लाल डिग्गी में हुआ था। उनके पिता पंडित ब्रज नाथ जी और माता श्रीमती मूनी देवी थी। दोनों आध्यात्मिक प्रकृति के थे और सनातन धर्म में आस्था रखते थे। कहा जाता है कि पंडित ब्रज नाथ के दादा पंडित प्रेमधर थे जो जाने माने संस्कृत विद्वान थे और मध्य भारत के राज्य मालवा के पंडित विष्णु प्रसाद जी के परिवार से ताल्लुक रखते थे। पंडित प्रेमधर के दादा बसने के लिए प्रयाग आए। उनके परिवार के अन्य सदस्य नजदीकी शहर, उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर में आए। पंडित प्रेमधर भगवत पुराण पर अपने बेहतरीन और मर्मस्पर्शी भाषणों के लिए प्रसिद्ध थे। अपने भाई-बहनों में मदन मोहन सबसे प्रतिभावान और बुद्धिमान थे। वे दूरदृष्टा थे। इसी दूरदृष्टा स्वभाव के कारण मदन मोहन ने नए भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वह सिर्फ राजनीतिक क्षेत्र में  तरह के नेतृत्व बल्कि शिक्षा के क्षेत्र में भी मानवता के मार्गदर्शक बन गए। उनका मानना था कि ज्ञान ही व्यक्ति को अपूर्ण से सम्पूर्ण और अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाता है। इस प्रकार उन्हें महामना के नाम से जाना गया।

शिक्षा:-

महामना की आरंभिक शिक्षा इलाहाबाद में पूरी हुई। महाजनी पाठशाला में पांच वर्ष की आयु से आरंभ करते हुए, मदन मोहन ने वास्तविक हिंदू संस्कार ग्रहण किए और विद्यालय में शिक्षा के दौरान वह अकसर हनुमान मंदिर जाते थे तथा हर रोज यह प्रार्थना करते थे।

मनोजवं मारूत तुल्य वेगं जितेन्द्रिय बुद्धिमतां वरिष्ठम्

वातात्मजं वानरयूथ मुख्यं श्री रामदूतं सिरसा नमामि ।।

श्री कृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर, वह इसे पूरे दिल से मनाते थे। उन्होंने मकरंद के नाम से 15 वर्ष की आयु में कविता लिखना आरंभ कर दिया था। उन्होंने 1868 में प्रयाग सरकारी हाई स्कूल से मैट्रिक पास की। फिर उन्होंने मायर सेंट्रल कालेज में प्रवेश ले लिया। वह स्कूल के साथ-साथ कालेज में भी कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेते थे। उन्होंने 1880 में हिंदू समाज की स्थापना की।

विवाह:-

उनका विवाह 16 वर्ष की आयु में मिर्जापुर के पंडित नंद लाल जी की सुपुत्री कुंदन देवी के साथ हुआ।

पंडित मदन मोहन मालवीय ने अनेक संगठनों की स्थापना की तथा सनातन धर्म के हिंदू विचारों को प्रोत्साहन देने तथा भारत को सशक्त बनाने और दुनिया का विकसित देश बनाने के लिए उच्च स्तर की पत्रिकाओं का संपादन किया। इस उद्देश्य से उन्होंने प्रयाग हिंदू समाज की स्थापना की और समकालीन मुद्दों और देश की समस्याओं पर अनेक लेख लिखे। 1884 में, वे हिंदी उद्धारिणी प्रतिनिधि सभा के सदस्य बन गए। 1885 में उन्होंने इंडियन यूनियन वीकली का संपादन किया। 1887 में, उन्होंने सनातन धर्म और हिंदू संस्कृति के प्रचार-प्रसार के लिए भारत धर्म महामंडल की स्थापना की। उन्होंनेे हिंदुस्तान का संपादन भी किया। 1889 में, उन्होंने इंडियन ओपिनियन का संपादन किया। 1891 में, वह बैरिस्टर बन गए और इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वकालत आरंभ कर दी। इन दिनों उन्होंने कई महत्वपूर्ण मुकदमों में पैरवी की।

1913 में उन्होंने वकालत छोड़ दी और ब्रिटिश राज से आजादी के लिए राष्ट्र की सेवा करने का फैसला किया। माहामना बेहतर शिक्षा हासिल करने और बेहतर जीवन जीने के लिए विद्यार्थियों की सहायता करने के बहुत इच्छुक थे और इसके लिए उन्होंने इलाहाबाद में मैकडोनल हिंदू होस्टल के निर्माण की व्यवस्था की। 1889 में उन्होंने एक पुस्तकालय की स्थापना की।

महामना 1916 तक इलाहाबाद में नगर पालिका के सदस्य रहे और कई वर्षों तक इंडियन नेशनल कांग्रेस के सम्मानित सदस्य भी रहे।

1907 मेंवसंत पंचमी के दिन उन्होंने हिंदी में साप्ताहिक अभ्युदय आरंभ किया। उन्होंने 1909 में अंग्रेजी साप्ताहिक लीडर के प्रकाशन में भी सहायता की।

अपने पिता के देहांत के बाद, उन्होंने कई तरह से राष्ट्र सेवा करने का निर्णय लिया। 1919 में, प्रयाग में कुंभ के पावन अवसर पर, उन्होंने श्रद्धालुओं की सेवा के लिए प्रयाग सेवा समिति की शुरुआत की।  महान महाकाव्य महाभारत से प्रेरित होकर उन्होंने खुद को निस्वार्थ सेवा में अर्पित कर दिया। महाभारत के निम्नलिखित श्लोक को उन्होंने अपना मंत्र बना लिया थाः

 

त्वहं कामये राज्यं, स्वर्गं पुनर्भवम्

कामये दुःख तप्तानाम् प्राणिनामार्तनाशनम् ।।

यह लक्ष्य बाद में आदर्श नारा बन गया।

बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी का निर्माण:-

पंडित मदन मोहन मालवीय आयरलैंड की महिला डॉ. एनी बेसेंट से बहुत प्रेरित थे जो शिक्षा कार्यक्रमों के प्रसार के उद्देश्य से भारत आई थीं। एनी बेसेंट ने 1889 में वाराणसी में कामाछा में सेंट्रल हिंदू कालेज की शुरुआत की जो बाद में बनारस हिंदू यूनिविर्सिटी से जुड़ गया। पंडित जी ने बनारस के तत्कालीन महाराजा श्री प्रभु नारायण सिंह जी की मदद से 1904 में बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी की स्थापना का प्रस्ताव किया। वर्ष 1905 में, इस प्रस्ताव को अनेक हिंदू संगठनों की स्वीकृति मिली। आखिरकार 31 दिसंबर, 1905 को वाराणसी के टाउन हाल में, श्री डी. एन. महाजन की अध्यक्षता में प्रस्ताव को स्वीकार किया गया।

1911 में, डॉ. एनी बेसंट की सहयोग से, काशी विश्वविद्यालय स्थापित करने का प्रस्ताव पारित किया गया। 28 नवंबर, 1911 को बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के लिए कार्य आरंभ करने के लिए सोसायटी बनाई गई। 25 मार्च, 1915 को सर हरकोर्ट बटलर ने यूनिवर्सिटी की स्थापना के लिए इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल में विधेयक का प्रस्ताव किया। पहली अक्तूबर, 1915 को बी एच यू एक्ट पारित हो गया।

4 फरवरी, 1916 अर्थात माघ शुक्ल प्रतिपदा, संवत 1972 को बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी की आधारशिला रखी गई। इस अवसर पर भव्य समारोह आयोजित किया गया जिसमें भारत की अनेक जानी-मानी हस्तियां उपस्थित थीं।

मालवीय जी के जीवन का संक्षिप्त परिचय

25.12.1861

इलाहाबाद में जन्म

1878

मिर्जापुर में कुंदन देवी के साथ विवाह

1884

कलकत्ता विश्वविद्यालय से स्नातक

जुलाई 1884

इलाहाबाद जिला स्कूल में शिक्षण

दिसंबर 1886

दादाभाई नारौजी की अध्यक्षता में कांग्रेस के दूसरे अधिवेशन में परिषदों में प्रतिनिधित्व के मामले पर भाषण

जुलाई 1887

कालकंकड में हिंदोस्तान का संपादन। भारत धर्म मंडल का स्थापना सम्मेलन

जुलाई 1889

संपादन छोड़कर इलाहाबाद में एलएलबी शुरू किया।

1891

एलएलबी पास कर इलाहाबाद जिला न्यायालय में वकालत शुरू की

दिसंबर 1893

इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकालत

मार्च 1898

यू.पी के गवर्नर को हिंदी के बारे में ज्ञापन सौंपा

1902-1903

इलाहाबाद में हिंदू बोर्डिंग हाउस का निर्माण

1903-1912

प्रांतीय परिषद में सदस्य के रूप में सेवा

1904

काशी नरेश की अध्यक्षता में विश्वविद्यालय स्थापित करने का प्रस्ताव

जनवरी 1906

इलाहाबाद के कुंभ मेले में सनातन धर्म महासभा का संचालन किया। उदार सनातन धर्म का प्रचार किया। बनारस में विश्वविद्यालय खोलने का फैसला

1907

अभ्युदय का संपादन। सनातन धर्म लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रचार

1909

अंग्रेजी दैनिक लीडर का संपादन। लाहौर कांग्रेस की अध्यक्षता

अक्टूबर 1910

पहले हिंदी साहित्य सम्मेलन में अध्यक्षीय संबोधन

22.11.1911

हिंदू विश्वविद्यालय सोसाइटी का गठन

दिसंबर 1911

50 साल की उम्र में वकालत छोड़ दी। देशसेवा और विश्वविद्यालय स्थापना के लिए कार्य करने का फैसला

फरवरी 1915

अपनी अध्यक्षता में प्रयाग सेवा समिति का गठन

अक्टूबर 1915

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय विधेयक पास हुआ

04 फरवरी 1916

विश्वविद्यालय की आधारशिला रखी गई

मार्च 1916

परिषद में ठेका मजदूरी व्यवस्था के खिलाफ प्रस्ताव

1916-18

सदस्य, औद्योगिक आयोग

1918

सेवा समिति द्वारा स्काउट एसोसिएशन का गठन

दिसंबर 1918

दिल्ली में वार्षिक कांग्रेस सम्मेलन की अध्यक्षता

फरवरी 1919

परिषद में रौलेट बिल पर बहस। परिषद से इस्तीफा

नवम्बर 1919-सितंबर1939

बीएचयू के वाइस चांसलर

19 अप्रैल 1919

बम्बई में हिंदी साहित्य सम्मेलन की अध्यक्षता

जनवरी 1922

सर्वदलीय सम्मेलन का संचालन

16 दिसम्बर 1922

लाहौर में हिंदू मुस्लिम सद्भाव पर भाषण

1924

जिला और विधानसभा में स्वतंत्र पार्टी का गठन। इलाहाबाद में संगम पर सत्याग्रह। स्टील संरक्षण बिल पर बहस।

अगस्त 1926

लाला लाजपत राय के साथ कांग्रेस स्वतंत्र पार्टी का गठन

फरवरी 1927

कृषि आयोग के समक्ष बयान

दिसंबर 1929

बीएचयू में दीक्षांत भाषण। छात्रों से देशसेवा देशभक्ति का आह्वान

1930

विधानसभा से इस्तीफा। दिल्ली में गिरफ्तारी। 6 महीने की सजा।

अप्रैल 1931

कानपुर में हिंदू मुस्लिम एकता पर भाषण

1931

लंदन में गांधी जी के साथ गोलमेज सम्मेलन में भाग लिया

मार्च 1932

बनारस में अखिल भारतीय स्वदेशी संघ का गठन

20 अप्रैल 1932

दिल्ली कांग्रेस के अध्यक्ष नामित। गिरफ्तारी।

अप्रैल 1932

कलकत्ता कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में आसनसोल में गिरफ्तारी

जनवरी 1936

इलाहाबाद में सनातन धर्म महासभा का संचालन।

1938

कल्प [आयुर्वेदिक कायाकल्प विधि]

नवंबर 1939

जीवनपर्यंत बीएचयू के रेक्टर नियुक्त

1941

गोरक्षा मंडल की स्थापना

जनवरी 1942

बीएचयू के रजत जयंती समारोह में गांधी जी का दीक्षांत

12 नवंबर 1946

मृत्यु

 * श्री वाई.एस. कटारिया पीआईबी नई दिल्ली में निदेशक (मीडिया संचार) हैं।

***

विजयलक्ष्मी कासोटिया/पीके/वीपी– 167

पूरी सूची 24-12-2014

 



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