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प्रधानमंत्री कार्यालय14-जुलाई, 2012 14:56 IST

प्रधानमंत्री ने किया मनरेगा समीक्षा का विमोचन
प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने आज नई दिल्‍ली में मनरेगा समीक्षा का‍विमोचन किया। इस अवसर पर दिए गए उनके भाषण का विवरण इस प्रकार है :

‘’मुझे ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा निकाली गयी महात्‍मा गांधी नरेगा समीक्षा का विमोचन करते हुए बहुत प्रसन्‍नता हो रही है। यह हमारे विकास कार्यक्रमों पर गौर करने का एक नया तरीका है। मैं श्री जयराम रमेश को देश के विभिन्‍न भागों में रहने वाले विद्वानों तक अपनी बात पहुंचाने के इस प्रयास की सराहना करता हूं, ताकि वे अपनी बुद्धि से इस बात का विश्‍लेषण कर सकें कि क्‍या उपलब्धियां हासिल की जा रही हैं, क्‍या संभव है, क्‍या उपलब्धियां अभी तक प्राप्‍त नहीं की जा रही हैं और कार्य निष्‍पादन में क्‍या कमियां हैं तथा जो कुछ हो रहा है उसके बारे में हमारी जानकारी में कितनी कमी है। मुझे उम्‍मीद है कि कार्यक्रमों को वास्‍तव में कितना समय लगा, उस पर गौर करने की इस प्रक्रिया में तेजी आएगी। मैं श्री जयराम से यह जानकर हैरान हूं कि मूल्‍यांकन की समवर्ती प्रक्रियाएं सही नहीं हैं। बहुत समय पहले जब मैं योजना आयोग में था, तो मेरे विचार से हमने ग्रामीण विकास के कई कार्यक्रमों के लिए समवर्ती मूल्‍यांकन का कार्यक्रम शुरू किया था। मुझे नहीं मालूम कि वे इतनी कमजोर क्‍यों पड़ गई हैं। लेकिन मैं श्री मोंटेक सिंह से अनुरोध करूंगा कि वे इस बारे में सोचें कि इस कमी को कैसे पूरा किया जा सकता है।

मुझे मनरेगा समीक्षा के विमोचन पर प्रसन्‍नता है। महात्‍मा गांधी राष्‍ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना शायद यूपीए सरकार का सबसे लोकप्रिय और सफल महत्‍वपूर्ण कार्यक्रम है। श्री जयराम रमेश ने अपनी समीक्षा में लिखा है कि शायद यह कार्यक्रम दुनिया में सबसे बड़ा और सबसे महत्‍वाकांक्षी सामाजिक सुरक्षा और सार्वजनिक निर्माण का कार्यक्रम है।

चाहे आंकड़े पूरे सच्‍चाई न बताते हों, लेकिन आंकड़ों की दृष्टि से महात्‍मा गांधी नरेगा योजना की गाथा बताने योग्‍य है। 2010-11 में लगभग साढे़ पांच करोड़ों परिवारों को, यानी चार ग्रामीण परिवारों में से लगभग एक परिवार को, इस कार्यक्रम के अंतर्गत 250 करोड़ दिहाडि़यों से अधिक के बराबर काम दिया गया। योजना के पहले वर्ष 2006-07 में 90 करोड़ दिहाडि़यों के मुकाबले यह संख्‍या बहुत अधिक है।

समावेशीकरण की दृष्टि से यह योजना बहुत उपलब्धिपूर्ण है। इस कार्य में अनुसूचित जातियों/ अनुसूचित जनजातियों के परिवारों का हिस्‍सा 51 प्रतिशत रहा है और महिलाओं को भागीदारी 47 प्रतिशत रही है। योजना शुरू होने के बाद से प्रति व्‍यक्ति दैनिक मजदूरी में 81 प्रतिशत की बढ़ोत्‍तरी हुई है। मुद्रास्‍फीति के प्रभाव से मजदूरों को बचाने के लिए इनकी मजदूरी को मुद्रास्‍फीति के सूचकांक के साथ जोड़ा गया है।

बैंकों और डाकघरों में मजदूरों के लगभग 10 करोड़ खाते खोले गए हैं और मनरेगा योजना के अंतर्गत लगभग 80 प्रतिशत भुगतान इसी जरिए से किया जाता है, जो वित्‍तीय समावेशीकरण की दिशा में एक अभूतपूर्व कदम है।

इस योजना के अंतर्गत जो सुरक्षा का पहलू है, उससे ग्रामीण भारत के लोगों को प्राकृतिक आपदाओं और बार-बार आने वाले संकटों से, जिन्‍हें वे अब तक झेलते आए हैं, निपटने में सहायता मिली है। विस्‍तारित कृषि उत्‍पादन, निर्माण क्षेत्र में मजदूरों की मांग और मनरेगा के संयुक्‍त प्रभाव से खेतिहर मजदूरों की उपलब्‍धता प्रभावित हुई है और धीरे-धीरे वास्‍तविक मजदूरी में बढ़ोत्‍तरी हुई है। किसान कई बार इस बारे में शिकायत करते हैं, लेकिन मजदूरों की मांग में बढ़ोत्‍तरी ही एक मात्र तरीका है, जिससे इन भूमिहीन लोगों के रहन-सहन के स्‍तर को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है। मनरेगा के अंतर्गत होने वाली आमदनी के कारण खेतिहर मजदूरों की सौदेबाजी की ताकत भी कुछ हद तक बढ़ी है और ग्रामीण निर्धनता को कम करने में मदद मिली है।

यह सब कहने का मतलब यह नहीं है कि हम इस योजना के काम से पूरी तरह संतुष्‍ट हैं। जयराम और मिहिर शाह दोनों ने उन कमियों की तरफ इशारा किया है, जिन्‍हें दूरे करने की जरूरत है। लेकिन यह संभवत: एक सच्‍चाई है कि हाल के समय में किसी भी कल्‍याण योजना ने लोगों का ध्‍यान अपनी तरफ इतना नहीं खीचा है, जितना कि महत्‍मा गांधी नरेगा योजना ने। लेकिन अभी कई चुनौतियों से निपटना है।

पंचायती राज संस्‍थाओं को इस योजना के अंतर्गत जो केन्‍द्रीय भूमिका दी गयी है, उसके लिए इन संस्‍थाओं को स्‍वयं को तैयार करना होगा और हमें पंचायतों को मजबूत बनाने के लिए संसाधन उपलब्‍ध कराने होंगे, ताकि वे इन कार्यों को कारगर ढंग से पूरा कर सकें। अगर ये स्‍थानीय संस्‍थाएं चुनौती से निपटने के लिए तैयार हो जाती हैं तो निश्चित रूप से महात्‍मा गांधी नरेगा योजना भारत के ग्रामीण पुर्नरुत्‍थान कार्यक्रम के लिए बहुत ही उपयोगी साबित हो सकती है।

स्‍थाई जलाशय बनाकर और उत्‍पादकता में सुधार से कृषि क्षेत्र को फिर से मजबूत बनाने की महात्‍मा गांधी नरेगा योजना की क्षमता का पूरा उपयोग किया जाना जरूरी है और हमें इस दिशा में आगे बढ़ना होगा तथा और तेजी से आगे बढ़ना होगा। कुछ अध्‍ययनों को देखने से पता चलता है कि यह मुद्दा बहुत जटिल है और स्‍थानीय दृष्टि से इनमें बहुत अंतर हैं। नीति निर्माताओं के सामने चुनौती है कि वे ऐसे लचीले, और समुदाय की आवश्‍यकताओं को ध्‍यान में रखने वाले वैज्ञानिक कार्यक्रम की रूप रेखा बनाएं, जिससे इस कार्यक्रम को लागू करने वाली एजेंसियां स्‍थानीय आवश्‍यकताओं और पारिस्थितियों के अनुकूल नए तरीके अपनाने को प्रोत्‍साहित हों।

इस योजना के लाभार्थियों में जागरूकता पैदा करना और उनमें निष्‍ठा और भागीदारी की भावना पैदा करना इस योजना के महत्‍वूपर्ण उद्देश्‍य हैं। समीक्षा में दर्शाया गया है कि इन मुद्दों को हल करने में स्‍थानीय प्रयास किस तरह सहायक हैं। राजस्‍थान में इस योजना की मुख्‍य बातों को ग्राम पंचायतों की दीवारों पर प्रदर्शित किया गया है। झारखंड में स्‍वयं सेवी संगठनों ने केन्‍द्र स्‍थापित किए हैं, जो लाभार्थियों में जागरूकता पैदा करने के साथ सेवाएं प्राप्‍त कराने में उनकी मदद भी करते हैं। इस प्रकार के स्‍वैच्छिक प्रयासों से ग्रामसभाओं की भी सहायता की जा सकती है।

महात्‍मा गांधी नरेगा योजना इलेक्‍ट्रानिक तरीके से सेवाएं उपलब्‍ध कराने में भी एक अग्रणी योजना है, जिससे पारदर्शिता में वृद्धि हुई है। इस योजना में हाल में उपयोग की जा रही प्रबंधन सूचना प्रणाली के जरिए 9 करोड़ से अधिक मस्‍टर रोल और 12 करोड़ से ज्‍यादा जॉब कार्ड ऑनलाइन तैयार किए गए हैं। मोबाइल संचार तकनीकों से इस प्रणाली का और भी विकास किया जा सकता है।

मैं यह जानकर उत्‍साहित महसूस कर रहा हूं कि आंध्र प्रदेश में आंकड़ों की प्रविष्‍टयां वास्‍तविक समय को दर्शाती हैं और मजदूरी के भुगतान के लिए पे-आर्डर ऑनलाइन तैयार किए जाते हैं, इससे भुगतान में देरी की समस्‍या सीधे तौर पर खत्‍म हो जाती है और इस पद्धति का इस्‍तेमाल अन्‍य स्‍थानों पर भी किया जाना चाहिए। जैसा कि श्री मेहर शाह ने कहा कि इस क्षेत्र में अभी कुछ समस्‍या है, और देरी से भुगतान की समस्‍या से जल्‍द निपट लिया जाएगा, मेरे विचार में इसके अच्‍छे परिणाम जल्‍दी सामने आएंगे।

समीक्षा में महिलाओं के सशक्तिकरण का अध्‍याय बहुत ही उत्‍साहवर्धक है। एक अध्‍ययन में कहा गया है कि इस योजना के परिणाम स्‍वरूप ग्रामीण महिलाओं में एक मौन क्रांति आ रही है। पुरुषों और स्त्रियों की मजदूरी के अंतर को कम किया जा रहा है तथा महिलाएं काम के लिए अधिक संख्‍या में सामने आ रही हैं। वे बैंकों, डाकघरों और सरकारी कर्मचारियों के साथ स्‍वयं बातचीत करती हैं। इससे उनके आत्‍मविश्‍वास में आशातीत वृद्धि हुई है और घरों के वित्‍तीय मामलों में भी अब उनकी बात ज्‍यादा सुनी जाती है।

इस पहल के परिणाम स्‍वरूप सामने आने वाले कई मुद्दों में से ये कुछ एक मुद्दे हैं, चाहे वे धन और संसाधनों के प्रबंधन से जुड़े हैं या ग्रामीण रोजगार के साथ इस योजना के जुड़ने से या नक्‍सलवाद से प्रभावित जिलों में इस कानून के लागू होने से पैदा हुए हैं।

महात्‍मा गांधी नरेगा योजना हमारे लाखों अत्‍यंत कमजोर नागरिकों को अधिकार, सुरक्षा और अवसर देने की उम्‍मीद जगाती है। यह योजना ग्रामीण बदलाव की एक अग्रणी योजना होने की संभावना जताती है, जिससे कृषि, सामुदायिक विकास, सतत रोजगार, जल प्रबंधन और स्‍वच्‍छता के क्षेत्र में सकारात्‍मक परिवर्तन आने की उम्‍मीदें हैं। इस समीक्षा से हमें यह सोचने का भरपूर अवसर मिलता है कि इस ऐतिहासिक योजना के शुरू होने के 6 वर्ष बाद हम कहां तक पहुंचे हैं।

मुझे उम्‍मीद है कि नीति निर्माता, जन प्रतिनिधि, कार्यक्रम लागू करने वाली एजेंसियां और सभ्‍य समाज इस तरह के कई और स्‍वतंत्र मूल्‍यांकन सामने लाएंगे जो हमारी समीक्षा और मूल्‍यांकन की प्रक्रिया का सामान्‍य हिस्‍सा बनेंगे।

मुझे आशा है कि ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा जारी किए जाने वाले योजना संचालन संबंधी नए मार्ग निर्देश उन कुछ मुद्दों को ध्‍यान में रखेंगे जो इन अध्‍ययनों से सामने आए हैं। अंत में मैं श्री जयराम रमेश और मंत्रालय में उनके सहयोगियों, डॉक्‍टर मिहिर शाह तथा राम मनोहर रेड्डी सहित अन्‍य उन सभी लोगों को बधाई देता हूं, जिन्‍होंने महात्‍मा गांधी नरेगा योजना की सफलता के लिए जी-जान से प्रयास किए हैं।‘’

मीणा/राजगोपाल/दयाशंकर- 3191
(Release ID 16433)


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